2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 109

92 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

ओर दो पंख हों तथा दूसरी ओर कोई पंख न हो तो मक्षिका उड़ ही नहीं पाएगा। इस बात पर बहस बेकार है कि एक व्यवस्था अच्छी है तो दूसरी व्यवस्था भी अच्छी होगी।‘‘ इसलिए नैतिकता और धर्म केवल पसंद और नापसंदगी के मुद्दे नहीं हैं। आप नैतिकता की व्यवस्था को अत्यधिक नापसंद कर सकते हैं, जिसे एक राष्ट्र में सार्वभौमिक रूप से लागू किया जाए तो वह राष्ट्र पृथ्वी पर एक सबसे मजबूत राष्ट्र बन जाएगा। आपकी नापसंदगी के बाद भी ऐसा राष्ट्र मजबूत हो जाएगा। आप किसी एक नैतिकता की व्यवस्था और न्याय के आदर्श को अत्यधिक पसंद कर सकते हैं, जो यदि किसी राष्ट्र में सार्वभौमिक रूप से लागू किया जाए तो वह राष्ट्र अन्य राष्ट्रों के साथ संघर्ष में खड़ा नहीं रह पाएगा। आपकी इस प्रशंसा के बावजूद ऐसा राष्ट्र अंततः लुप्त हो जाएगा। हिन्दुओं को अपने धर्म और नैतिकता को अस्तित्व के मूल्यों के संदर्भ में परखना चाहिए।

दूसरी बात यह है कि हिन्दुओं को इस पर विचार करना चाहिए कि उन्हें अपनी संपूर्ण सामाजिक धरोहर को सुरक्षित रखना है या जो उपयोगी हो उसे चुनकर भावी पीढि़यों को केवल उतना ही हस्तांतरित करना है और उससे अधिक बिल्कुल नहीं। प्रोफेसर जॉन डिवी, जो मेरे शिक्षक रहे हैं तथा जिनका मैं ऋणी हूं, ने कहा है, ‘‘प्रत्येक समाज छोटी सी बातों से, अतीत की सूखी लकडि़यों से तथा निश्चित रूप से विकृत चीजों से भार - ग्रस्त हो जाता है। चूंकि समाज अधिक प्रबुद्ध हो जाता है, इसलिए यह महसूस करता है कि वह संरक्षण के लिए उत्तरदायी नहीं है और अपनी वर्तमान समग्र उपलब्धियों के प्रेषण के लिए भी उत्तरदायी नहीं है, परंतु वह केवल इस बात का उत्तरदायी है कि अधिक श्रेष्ठ भावी समाज का निर्माण किया जाएं‘‘ यहां तक कि बर्क फ्रांस की क्रांति में निहित सिद्धांतों के बदलाव का तीव्र विरोध करने के बावजूद यह मानने को बाध्य हुआ कि ‘‘ऐसा राज्य जो बदलाव के साधन से रहित है, वह राज्य के रक्षण के साधनों से भी रहित है। बदलाव के साधन के बिना ऐसे राज्य को संविधान के उस भाग का नुकसान होने का भी जोखिम उठाना पड़ेगा, जिस भाग की यह धर्मनिष्ठा से रक्षा करना चाहता है।‘‘ बर्क ने राज्य के बारे में जो कहा है, वही बात समाज के बारे में भी लागू होती है।

तीसरी बात यह है कि हिन्दुओं को अतीत की पूजा बंद करने पर विचार करना चाहिए। इस पूजा के गलत परिणामों के बारे में प्रोफेसर डिवी ने कहा है, ‘‘व्यक्ति केवल वर्तमान में जी सकता है। वर्तमान, भूतकाल के बाद नहीं आता या इसे भूतकाल का परिणाम ही नहीं मानेंगे। जीवन इसी में है कि अतीत को वर्तमान के पीछे छोड़ दिया जाए। अतीत के परिणामों के अध्ययन से ही वर्तमान को समझने में मदद नहीं मिलेगी। अतीत का तथा अतीत की धरोहर का वर्तमान में प्रवेश करने को ही महत्वपूर्ण समझना, अन्यथा नहीं। अतीत के रिकार्ड तथा अवशेष को बनाने में हुई गल्तियों को शिक्षा का प्रमुख साधन बना देने से अतीत को हम वर्तमान का विरोधी बना देते हैं तथा वर्तमान के हम बहुत कुछ अतीत की नकल बना देते हैं।’’ ऐसा सिद्धांत जो वर्तमान के जीने एवं आगे बढने के कर्म को छोटा मानता है, वर्तमान को रिक्त समझता है तथा भविष्य को बहुत दूर। ऐसा सिद्धांत प्रगति का दुश्मन है और जीवन के तेज व अनवरत प्रवाह में बाधा पैदा करता है।