जातिप्रथा - उन्मूलन
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चौथा, क्या हिन्दुओं को इस पर विचार कर मान नहीं लेना चाहिए कि कुछ भी स्थिर नहीं है, कुछ भी शाश्वत नहीं है और न ही कुछ सनातन है, हर चीज परिवर्तनशील है, व्यक्ति और समाज के लिए परिवर्तन जीवन का नियम है। एक बदलते हुए समाज में पुराने मूल्यों में सतत क्रांतिकारी बदलाव आना चाहिए तथा हिन्दुओं को यह महसूस करना चाहिए कि यदि कार्यों को मापने के कुछ मानक हैं तो उन मानकों को सुधारने के लिए तैयार रहना चाहिए।
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मुझे यह बात स्वीकार करनी पड़ेगी कि यह भाषण बहुत लंबा हो गया है। अब आपको निर्णय करना है कि अधिक सीमा तक इस गलती की क्षतिपूर्ति हुई है या नहीं। मैं यही दावा करता हूं कि मैंने अपने विचार स्पष्ट रूप से बता दिए हैं। मेरे पास इन विचारों की अनुशंसा के लिए कुछ अध्ययन और आपकी नियति के लिए गहन चिंता के सिवाय बहुत थोड़ा है। अगर आप मुझे अनुमति दें तो मैं कहूंगा कि ये विचार उस व्यक्ति के हैं, जो व्यक्ति न तो सत्ता का औजार है और न ही बड़ों का चाटुकार। ये विचार ऐसे व्यक्ति के हैं, जिसका सार्वजनिक जीवन गरीब और दबे - कुचले लोगों की स्वतंत्रता के लिए समर्पित है, लेकिन जिसकी राष्ट्रीय नेताओं और समाचारपत्रों ने निंदा की। मैं बिना दांवपेंच खेले यह कहना चाहूंता हूं कि ऐसे नेताओं का साथ देने से मैं इन्कार करता हूं, जो निरकुंश के स्वर्ण से तथा रईस के धन से दबे - कुचले लोगों को स्वतंत्रता दिलाने का चमत्कार दिखाना चाहते हैं। मेरे विचारों की सिफारिश के लिए इतना सब काफी नहीं है। मैं सोचता हूं कि शायद ये विचार आपके विचारों को नहीं बदल पाएंगे। ये विचार ऐसा कर पाते हैं या नहीं, यह बात आप पर निर्भर है। आपको जातपांत को जड़ से उखाड़ फेंकने का काम अगर मेरे मार्गदर्शन से नहीं हुआ तो मैं आपका साथ नहीं दे पाऊंगा। मैंने भी बदलने का फैसला कर लिया है। यह उपयुक्त स्थान नहीं है, जहां इसके लिए मैं कारण बताऊं। लेकिन आपके दायरे से बाहर जाने के बाद भी मैं आपके आंदोलन को सक्रिय सहानुभूति से परखता रहूंगा। तथा मैं यथाशक्ति आपकी सहायता करता रहूंगा। आपका यह एक राष्ट्रीय लक्ष्य है। इसमें संदेह नहीं है कि जातपांत हिन्दुओं की धड़कन है। पर हिन्दुओं ने वातावरण को प्रदूषित किया है, जिससे प्रत्येक संक्रमित है, जिसमें सिख, मुस्लिम और ईसाई भी शामिल हैं। आप, सिख, मुस्लिम और ईसाई सहित उन सबके समर्थन के पात्र हैं, जो इस संक्रमण से ग्रसित हैं। आपका राष्ट्रीय आंदोलन अन्य राष्ट्रीय आंदोलनों से कठिन है, जैसे कि स्वराज। स्वराज के लिए संघर्ष में सारा राष्ट्र आपके साथ संघर्ष करता है। लेकिन आपके आंदोलन में आपको अपने ही राष्ट्र के साथ लड़ना पड़ता है। लेकिन यह आंदोलन स्वराज से ज्यादा महत्वपूर्ण है। स्वराज का कोई मतलब नहीं रह जाएगा, अगर आप इसकी रक्षा न कर पाए। स्वराज से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न स्वराज के अंतर्गत हिन्दुओं को बचाना है। मेरे विचार से हिन्दु समाज जब एक जातिहीन समाज बन जाएगा, तभी इसके पास स्वयं को बचाने के लिए काफी शक्ति होगी। इस आंतरिक ताकत के बिना हिन्दुओं के लिए स्वराज, गुलामी की ओर केवल एक कदम होगा। अलविदा तथा आपकी सफलता के लिए मेरी शुभकामनाएं।