2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 111

94 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

परिशिष्ट - I
महात्मा गांधा द्वारा जातपांत का दोषनिवारण
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डॉ. अम्बेडकर का अभ्यारोपण

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पाठकों को याद होगा कि डॉ. अम्बेडकर ने लाहौर के जातपांत तोड़क मंडल के वार्षिक सम्मेलन की अध्यक्षता विगत मई माह में करनी थी। लेकिन स्वागत समिति ने डॉ. अम्बेडकर का भाषण अस्वीकार्य होने पर सम्मेलन का आयोजन ही स्थगित कर दिया था। अपनी पसंद के अध्यक्ष का भाषण आपत्तिजनक पाए जाने पर उसे स्वागत समिति द्वारा अस्वीकार करना कहां तक न्याय संगत है, जब कि उस भाषण पर प्रश्न उठाने के अवसर खुले थे। समिति जातपांत और हिन्दू धर्म - ग्रंथों के बारे में डॉ. अम्बेडकर के दृष्टिकोण से परिचित थी। उन्हें पता था कि डॉ. अम्बेडकर खुले शब्दों में हिन्दू धर्म छोड़ने का फैसला दे चुके थे। डॉ. अम्बेडकर से इस भाषण को कम करने की अपेक्षा ही नहीं करनी चाहिए थी। समिति ने जनता को एक ऐसे व्यक्ति के विचार सुनने से वंचित किया है, जिसने अपने लिए समाज में एक अद्वितीय स्थान बना लिया है। चाहे वह भविष्य में कोई भी आवरण ओढ़ ले, डॉ. अम्बेडकर अपने आपको भुलाने का अवसर नहीं देंगे।

सवागत समिति डॉ. अम्बेडकर को पराजित नहीं कर पाई। उन्होंने यह भाषण अपने

खर्चें पर प्रकाशित करके प्रत्युत्तर दे दिया है। उन्होंने प्रकाशित भाषण की कीमत आठ आना रखी। मेरा सुझाव है कि इसकी कीमत घटाकर दो आना नहीं तो कम से कम चार आना कर दी जाए।

कोई भी सुधारक इस भाषण की उपेक्षा नहीं कर सकता। रूढि़वादी लोग इसे पढ़कर लाभान्वित होंगे। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि भाषण पर आपत्ति उठाने का अवसर खुला नहीं है। डॉ. अम्बेडकर हिन्दू धर्म के लिए एक चुनौती हैं। एक हिन्दू के रूप में उनका पालन - पोषण हुआ, एक हिन्दू राजा द्वारा पढ़ाए गए लेकिन वह तथाकथित सवर्णों से घृणा करते हैं, क्योंकि उन्होंने उनके साथ एवं उनके लोगों के साथ इतना दुर्व्यवहार किया है कि डॉ. अम्बेडकर ने उसी धर्म को छोड़ने का फैसला कर लिया है, जो सबकी सामूहिक धरोहर है। उन्होंने अपनी घृणा को उस धर्म के मानने वालों के एक हिस्से के विरुद्ध मोड़ दिया है।