जातिप्रथा - उन्मूलन
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लेकिन इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आखिर, किसी व्यवस्था या संस्था की परख उसके प्रतिनिधियों के व्यवहार से की जा सकती है। इसके अतिरिक्त डॉ. अम्बेडकर ने पाया कि सवर्ण हिन्दुओं के बहुमत ने अपने सह - धर्मावलंबियों के साथ उनको अछूत मानकर धर्मशास्त्रीय आधार पर अमानवीय व्यवहार किया है और जब उन्होंने खोज की, तो छुआछूत और उसके उपलक्षणों को मानने वालों के विरुद्ध बहुत अधिक प्रमाण उन्हें मिले। भाषण के लेखक ने अपने कथन के समर्थन में अध्याय और श्लोकों के प्रमाण देकर तीन आरोप लगाए हैं - पहला, अमानवीय व्यवहार करना, दूसरा, अत्याचार करने वालों ने निर्लज्जता से उसे सही बताया, और तीसरा, यह कहना कि धर्मशास्त्रों में ऐसे व्यवहार को उचित माना गया है।
कोई भी हिन्दू जो अपनी आस्था को जीवन से अधिक मानता है, वह दोषारोपण के महत्व को कम करके आंकलन नहीं कर सकता है। डॉ. अम्बेडकर (इस अमानवीय व्यवहार से) घृणा करने वाले अकेले व्यक्ति नहीं हैं। लेकिन वह इसके सबसे अधिक दृढ़ प्रतिज्ञ प्रतिवादक हैं तथा इसका प्रतिपादन करने वालों में सबसे योग्य व्यक्ति हैं। भगवान का धन्यवाद है कि अगली पंक्ति के नेता में वे सबसे अकेले हैं और तब भी व थोड़ से अल्पसंख्यक लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन जो भी वे कहते हैं वह थोड़ा कम या ज्यादा जोर से दलित वर्ग के नेताओं द्वारा दुहराया जाता है। उदाहरण के लिए, रायबहादुर एम. सी. राजा तथा दीवान बहादुर श्रीनिवासन न केवल हिन्दू धर्म छोड़ देने की धमकी देते हैं, बल्कि हरिजनों के बहुत बड़े वर्ग के शर्मनाक प्रतीड़न की क्षतिपूर्ति के लिए इसको - साहजनक पाते हैं।
हम यह नहीं कह सकते हैं कि यह तथ्य ध्यान देने योग्य नहीं है, क्योंकि कई नेता डॉ. अम्बेडकर के कथन की अवहेलना कर हिन्दू बने रहेंगे। सवर्णों को अपनी मान्यता तथा व्यवहार को सही करना होगा। सवर्णों में जो विद्वान हैं तथा प्रभावशाली हैं, उन्हें धर्मशास्त्रों की अधिकृत तथा सही व्याख्या करनी होगी। डॉ. अम्बेडकर के अभियोग - पत्र ने जो प्रश्न उठाए हैं, वे इस प्रकार हैं :
(1) धर्मशास्त्र क्या हैं?
(2) क्या छपे हुए मूलपाठ को धर्मशास्त्रों का अंगभूत हिस्सा माना जाए, या इसके
किसी हिस्से को अनधिकृत रूप से अस्वीकृत माना जाए?
(3) छुआछूत, जाति, प्रतिष्ठा की समानता, रोटी - बेटी के संबंध के प्रश्न पर धर्मशास्त्रों
के मान्य व परिशोधित अंश का क्या उत्तर दिया जाए?
(इन सब प्रश्नों का डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में विशद् विवेचन किया है)। इन प्रश्नों के उत्तर तथा डॉ. अम्बेडकर के शोधपूर्ण भाषण में निहित गलतियों पर मैं अपना वक्तव्य अगले अंक में दूंगा।
(‘हरिजन‘ जुलाई 1936)