96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
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‘रामायण‘ और ‘महाभारत‘ सहित वेद, उपनिषद, स्मृतियां और पुराण हिन्दू धर्मशास्त्र हैं। लेकिन यही अंतिम सूची नहीं है। प्रत्येक युग और पीढ़ी ने इस सूची में कुछ न कुछ जोड़ा है। इससे निष्कर्ष निकलता है कि जो कुछ छपा है या हाथ से लिखा गया है, वही धर्मशास्त्र नहीं है। उदाहरण के लिए, स्मृतियों में बहुत कुछ है लेकिन उसे ईश्वर की वाणी नहीं स्वीकार किया जा सकता है। इस प्रकार कई उदाहरण जो डॉ. अम्बेडकर ने स्मृतियों से दिए हैं, उन्हें अधिकृत नहीं माना जा सकता। सही धर्म ग्रंथ उन्हें ही कहा जा सकता, जो शाश्वत हैं तथा अंतःकरण को छूते हैं, अर्थात् उन लोगों के हृदय को आकर्षित करते हैं, जिनके ज्ञान चक्षु खुले हों। उसे ईश्वर की वाणी नहीं माना जा सकता, जो तर्क की कसौटी पर खरी न उतरे, या जिसे आध्यात्मिक प्रयोग में न लाया जा सके। और यदि आपके पास धर्मग्रंथ का परिशोधित संस्करण है तो भी आपको उसकी टीका की आवश्यकता पड़ेगी। सबसे अच्छा टीकाकार कौन है? आवश्यक रूप से विद्वान नहीं हो सकता। फिर भी विद्वता आवश्यक है। लेकिन धर्म विद्वता पर नहीं चलता। धर्म साधू - संतों और उनके जीवन एवं कथन पर चलता है। साधू - संतों के संचित अनुभव को लोग मानते हैं व युगों तक प्रेरणा पाते हैं, जब कि धर्मग्रंथों के सबसे अच्छे विद्वान टीकाकारों को लोग भुला देते हैं।
जातपांत का धर्म से कोई मतलब नहीं है। जाति एक रीति - रिवाज है, जिसके उद्गम को मैं नहीं जानता और न ही अपनी आध्यात्मिक क्षुधा की संतुष्टि के लिए जानना चाहता हूं। मैं नहीं जानता कि जाति आध्यात्मिक व राष्ट्रीय विकास के लिए हानिकारक है। वर्ण और आश्रम व्यवस्था ऐसी संस्थाएं हैं, जिनको जातपांत से कुछ लेना - देना नहीं है। वर्ण - व्यवस्था का नियम सिखाता है कि पैतृक धंधा अपनाकर हम अपनी रोजी - रोटी कमा सकते हैं। यह हमारे अधिकार को ही नहीं, बल्कि कर्तव्य को भी परिभाषित करता है। वर्ण - व्यवस्था अवश्य ही व्यवसाय के संदर्भ में बनी है, जो केवल मानवता के कल्याण के लिए है और किसी अन्य के लिए नहीं। इसका अर्थ यह भी है कि कोई भी व्यवसाय न तो अत्यधिक नीचा है, न ही अत्यधिक ऊंचा। सारे व्यवसाय अच्छे विधि - सम्मत तथा स्तर में एक दम एक समान हैं। ब्राह्मण का आध्यात्मिक शिक्षक का व्यवसाय तथा सफाई करने वाले का व्यवसाय एक समान है, जो भगवान के सामने एक जैसे पुण्य के काम हैं और उसके समक्ष एक समय में पूरा काम करने पर समान पारिश्रमिक के अधिकारी हैं। दोनों को जीवनयापन का अधिकार है और कुछ नहीं। आज भी गांवों में ऐसी विधि - सम्मत स्वस्थ परंपरा जारी है। 600 की आबादी वाले गांव में रहकर मैंने पाया कि ब्राह्मण सहित विभिन्न व्यवसाय में रत लोगों में कोई असमानता नहीं है। मैंने पाया कि आज के बुरे दिनों में ब्राह्मण को सभी खुले हाथ से भीख देते हैं। उसके बदले ब्राह्मण के पास जो भी आध्यात्मिक खजाना है, वह उसे बांटता है। वर्ण - व्यवस्था के विकृत स्वरूप की जांच करना गलत और अनुचित होगा, जब उसके नियम का उल्लंघन होता है। किसी वर्ण में