जातिप्रथा - उन्मूलन
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रहकर श्रेष्ठता का दावा झूठा होगा और इस कानून को नकारात्मक माना जाएगा। वर्ण - व्यवस्था के कानून में छुआछूत की मान्यता निहित नहीं हैं? (हिन्दू धर्म का सार है कि सत्य ही ईश्वर तथा अहिंसा मानव परिवारों का कानून है)। मुझे पता है कि हिन्दू धर्म की मेरी इस व्याख्या का डॉ. अम्बेडकर के अलावा कई लोग प्रतिवाद करेंगे। इससे मेरी स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इस व्याख्या के आधार पर मैं लगभग आधी शताब्दी तक जिया हूं तथा मैंने भरसक इन्हीं मान्यताओं को जीवन में उतारने का प्रयास किया है।
मेरे विचार से डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में संदेहपूर्ण प्रमाणिकता और मूल्य तथा गिरे हुए हिन्दुओं के शोचनीय मिथ्या निरुपण को, जो धर्म के सही उदाहरण नहीं है, चुनकर गंभीर गलती की है। जिन मानकों को डॉ. अम्बेडकर ने अपनाया है, उससे तो प्रत्येक विद्यमान धर्म संभवतः असफल हो जाएगा।
अपने योग्यतापूर्ण भाषण में डाक्टर ने अपने मुद्दे को अत्यधिक सिद्ध करने की कोशिश की है। क्या चैतन्य, ज्ञानदेव, तुकाराम, तिरुवल्लूवर, रामकृष्ण परमहंस, राजा राममोहन राय, महर्षि देवेन्द्र - नाथ टैगोर, विवेकानंद व अन्य विद्वानों द्वारा सिखाया धर्म पूरी तरह गुणरहित है, जैसा कि डॉ. अम्बेकर ने अपने भाषण में बताया है। कोई धर्म उसे सबसे
खराब उदाहरण से नहीं, बल्कि सबसे अच्छे परिणाम से परखा जाना चाहिए। यदि हम इसे सुधार न पाए तो केवल इस प्रकार के मानक की आकांक्षा ही की जा सकती है।
(‘हरिजन‘ 18 जुलाई 1936)
वर्ण बनाम जाति
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श्री संत रामजी, जातपांत तोड़क मंडल, लाहौर, ने इच्छा व्यक्त की कि उनका निम्नलिखित व्यक्तव्य प्रकाशित किया जाए।
‘‘मैंने डॉ. अम्बेडकर और जातपांत तोड़क मंडल, लाहौर के बारे में आपकी टिप्पणी पढ़ी। इस संबंध में मैं निवेदन करना चाहता हूं :
हमने डॉ. अम्बेडकर को अपने सम्मेलन की अध्यक्षता करने के लिए नहीं बुलाया क्योंकि वे दलित वर्ग के हैं, चूंकि हम लोग छूत और अछूत में भेद नहीं करते हैं। इसके विपरीत हमने डॉ. अम्बेडकर का चुनाव इसलिए किया कि हिन्दू समाज की गंभीर बीमारी का निदान उनका और हमारा एक जैसा है, अर्थात उनका भी यही मत था कि हिन्दुओं में विघटन और पतन का मूल कारण जाति - व्यवस्था है। डाक्टर की डाक्टरेट की थीसीस का विषय भी जाति - व्यवस्था था। उन्होंने इस विषय पर संपूर्ण रूप से अध्ययन किया हुआ था। हमारे सम्मेलन का उद्देश्य जाति - व्यवस्था समाप्त करने के लिए हिन्दुओं को राजी करना था, लेकिन एक गैर - हिन्दू की सामाजिक और धार्मिक मामलों में सलाह कोई प्रभाव