98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
नहीं डाल सकती। डाक्टर अपने भाषण के पूरक भाग में यह बात कहने पर अड़े रहे कि हिन्दू के रूप में उनका यह अंतिम भाषण है, जो सम्मेलन के हित में अप्रासांगिक और घातक था। इसलिए हमने उनसे निवेदन किया था कि वे अपने भाषण से वह वाक्य निकाल दें, क्योंकि वही बात कहने के लिए उन्हें कोई अन्य अवसर भी मिल सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इन्कार कर दिया, ऐसी स्थिति में हमने देखा कि केवल सम्मेलन का दिखावा करने का कोई प्रयोजन नहीं था। इस सबके बावजूद उनके भाषण की मैं प्रशंसा करता हूं, क्योंकि इस विषय पर यह सबसे विद्वतापूर्ण थीसिस है, जिसका अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद होना चाहिए।‘‘ ‘‘इसके अलावा, मैं इस ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि जाति और वर्ण में जो आपने दार्शनिक अंतर बताया है, वह इतना अधिक सूक्ष्म है, जो आम आदमी की समझ में नहीं आता है, क्योंकि व्यावहारिक दृष्टि में जाति और वर्ण एक ही चीज हैं चूंकि दोनों का कृत्य एक समान है, अर्थात् अंतर्जातीय विवाह और सहभोज पर रोक। आपका वर्ण - व्यवस्था का सिद्धांत वर्तमान में अव्यावहारिक है और निकट भविष्य में इसके पुनरुत्थान की कोई आशा नहीं है। केवल हिन्दू जातपांत के गुलाम हैं तथा इसे वे नष्ट नहीं करना चाहते। अतः जब आप काल्पनिक वर्ण - व्यवस्था की वकालत करते हैं तो वे जातपांत से चिपकने को न्यायसंगत पाते हैं। इस प्रकार आप वर्ण भेद की उपयोगिता से समाज सुधार को क्षति पहुंचा रहे हैं, क्योंकि इससे हमारे रास्ते में रोड़ा अटकता है। वर्ण - व्यवस्था की जड़ पर हमला किए बिना छुआछूत मिटाने की कोशिश करना रोग के बाहरी लक्षणों का इलाज करने या पानी की सतह पर लकीर
खींचने जैसा है। द्विज लोग हृदय के किसी कोने से भी तथाकथित छूत और अछूत शूद्रों को सामाजिक समानता नहीं देना चाहते हैं, इसलिए वे जातपांत को तोड़ने तथा छुआछूत को मिटाने में उदारता दिखाने से इन्कार करते हैं, जिसका साधारण अर्थ है कि वे इस मुद्दे से बचना चाहते हैं। छुआछूत मिटानो के लिए शास्त्रों की मदद लेने का अर्थ है, कीचड़ साफ करना।
श्री संत रामजी के पत्र का प्रथम पैराग्राफ अंतिम पैरे को रद्द करता है। यदि मंडल शास्त्रों की मदद लेना अस्वीकार करता है तो वह बिल्कुल वही कर रहा है, जो डॉ. अम्बेडकर कर रहे हैं, अर्थात् हिन्दू न बने रहने तक कैसे वह डॉ. अम्बेडकर के भाषण पर आपत्ति उठा सकते हैं, जिसमें उन्होंने कहा है कि हिन्दू के रूप में उनका यह अंतिम भाषण है? स्थिति पूरी तरह अतर्क - संगत हो जाती है, विशेष तौर पर जब मंडल के प्रवक्ता बनने का दावा करते हुए श्री संत राम डॉ. अम्बेडकर के भाषण के तर्कों की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं।
यहां यह पूछना उचित है कि यदि शास्त्रों को अस्वीकार करता है तो मंडल किस बात में विश्वास रखता है। कुरान को अस्वीकार कर कोई मुसलमान कैसे बना रह सकता है और बाईबल को अस्वीकार कर कोई ईसाई कैसे बना रह सकता है? यदि जाति और वर्ण एक दूसरे के पर्याय हैं और वर्ण शास्त्रों का अंगभूत हिस्सा है, जिसमें हिन्दू धर्म की