जातिप्रथा - उन्मूलन
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परिभाषा निहित है तो मैं नहीं समझता कि जाति अर्थात् वर्ण को अस्वीकार कर कोई हिन्दू कैसे कहला सकता है।
श्री संत राम शास्त्रों को कीचड़ मानते हैं। जहां तक मुझे याद है डॉ. अम्बेडकर ने शास्त्रों को ऐसा विलक्षण नाम नहीं दिया है। मेरा अर्थ निश्चित रूप से यही है कि यदि शास्त्र छुआछूत का समर्थन करते हैं तो मैं अपने को हिन्दू कहलाना नहीं चाहूंगा। इसी प्रकार यदि शास्त्र जातपांत का समर्थन करते हैं तो मैं अपने आपको हिन्दू कहलाना या रहना नहीं चाहूंगा, क्योंकि सहभोज और अंतर्जातीय विवाह से मुझे बिल्कुल भी संकोच नहीं है। मैं शास्त्र और उसकी व्याख्या के बारे में अपनी स्थिति को दोहराना नहीं चाहता हूं। मैं श्री संत राम को साहसिक सुझाव देना चाहता हूं कि यहीं तर्कपूर्ण, सही और नैतिक रक्षात्मक स्थिति है और हिन्दू परम्परा में इसे उचित प्रामाणिक सिद्ध करने का आधार मौजूद है।
(‘हरिजन‘ 15 अगस्त 1936)
परिशिष्ट II
डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा महात्मा को उत्तर
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मैं महात्मा का बड़ा आभारी हूं कि उन्होंने जाति पर जातपांत तोड़क मंडल के लिए लिखे गए मेरे भाषण पर अपने समाचार - पत्र ‘हरिजन‘ में विचार व्यक्त करके मुझे सम्मानित किया है। मेरे भाषण के पुनरावलोकन के परिशीलन से पता चलता है कि महात्मा मेरे जाति पर व्यक्त किए गए विचारों से पूरी तरह असहमत हैं। मैं अपने विरोधियों के वाद - विवाद में नहीं पड़ना चाहता हूं, जब तक अन्यथा कार्यवाही करने के विशेष कारण मुझे मजबूर न करें। यदि मेरा विरोधी क्षुद्र और अज्ञात व्यक्ति होता तो मैं उसके पीछे नहीं पड़ता। लेकिन मेरे विरोधी महात्मा स्वयं हैं, इसलिए मैं महसूस करता हूं कि मुझे उन मुद्दों पर प्रत्युत्तर देने का प्रयास अवश्य करना चाहिए, जो उन्होंने उठाए हैं। यद्यपि मैं आभारी हूं, उन्होंने मेरा सम्मान किया है, मुझे इस बात पर आश्चर्य है कि महात्मा ने मुझ पर आरोप लगाया है कि भाषण न देने के बाद भी भाषण इसलिए प्रकाशित किया है कि मेरा प्रचार हो और लोग मुझे ‘भूल‘न जाएं। महात्मा चाहे जो कहें, भाषण प्रकाशित करने का मेरा उद्देश्य केवल यह था कि हिन्दू सोचें और अपनी स्थिति को जानें। अगर मैं ऐसा कहूं कि मैं अपने प्रचार के पीछे नहीं हूं क्योंकि मेरी इच्छा और आवश्यकता से अधिक मेरी प्रसिद्धि पहले से ही है। लेकिन यदि मान भी लिया जाए कि मैंने प्रसिद्धि पाने के उद्देश्य से भाषण छापा है तो मेरे ऊपर पत्थर कौन फेंक सकता था? निश्चित रूप से वे नहीं, जो महात्मा की तरह कांच के मकान में रहते हैं।