100 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
प्रयोजन के अलावा, भाषण में उठाए गए प्रश्न के बारे में महात्मा को क्या कहना है? पहली बात यह है कि जो भी मेरा भाषण पढ़ेगा, उसे अहसास होगा कि महात्मा ने मेरे द्वारा उठाए गए मुद्दों को पूरी तरह छोड़ दिया है और उन्होंने जो मुद्दे उठाए हैं, वे मुद्दे उस भाषण से उत्पन्न नहीं होते, जिसे उन्होंने हिन्दुओं के लिए मेरा अभियोग - पत्र बताने में प्रसन्नता अनुभव की है। प्रमुख मुद्दे जिन्हें मैंने अपने भाषण में उठाए हैं, उनको निम्नलिखित रूप में सूचीबद्ध किया जा सकता है।
(1) यह कि जातपांत ने हिन्दुओं को बरबाद किया है।
(2) यह कि हिन्दू समाज को चातुर्वर्ण्य के आधार पर पुनर्गठित करना असंभव है,
क्योंकि वर्ण - व्यवस्था रिसते हुए एक बर्तन की तरह है या उस आदमी की
तरह है, जो नाक की सीध में दौड़ रहा है। यह अपने गुणों के कारण अपने
को कायम रखने में अक्षम है तथा इसमें जाति - व्यवस्था के रूप में विकृत हो
जाने की प्रवृत्ति अंतर्निहित है जब कि वर्ण का उल्लंघन करने पर कानूनी रोक
नहीं लगती।
(3) यह कि चातुर्वर्ण्य के आधार पर हिन्दू समाज को पुनर्गठित करना हानिकारक
है, क्योंकि वर्ण - व्यवस्था ज्ञात प्राप्त करने के अवसर से वंचित कर लोगों को
निम्नकोटि बनाती है तथा अस्त्र धारण करने से वंचित कर उन्हें दुर्बल बनाती
है।
(4) यह कि हिन्दू समाज को ऐसे धर्म के आधार पर पुनर्गठित करना चाहिए, जिसमें
स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व के सिद्धांत को मान्यता दी जाए।
(5) यह कि इस लक्ष्य को पाने के लिए जाति और वर्ण के पीछे धार्मिक पवित्रता
की भावना को नष्ट किया जाना चाहिए।
(6) यह कि जाति और वर्ण की पवित्रता केवल तभी नष्ट हो सकती है, जब शास्त्रों
की दिव्य सत्ता को अलग कर दिया जाए।
ऐसा देखा गया कि महात्मा द्वारा उठाए गए प्रश्न मुद्दे से बिल्कुल अलग हैं, जिससे भाषण के मुख्य तर्क उसमें खो गए थे।
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मैं महात्मा द्वारा उठाए गए प्रश्न के सार को जांचना चाहूंगा। महात्मा ने पहला प्रश्न उठाया है कि मेरे द्वारा उद्धृत उदाहरण प्रामाणिक नहीं हैं। मैं स्वीकार करता हूं कि मैं इस विषय का विशेषज्ञ नहीं हूं। लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि जो उदाहरण मैंने उद्धृत किए हैं, वे श्री तिलक के लेखों से लिए गए हैं, जो संस्कृत भाषा और हिन्दू शास्त्रों के जाने - माने विद्वान थे। उन्होंने दूसरी बात यह कही है कि शास्त्र की व्याख्या विद्वानों द्वारा नहीं, बल्कि संतों द्वारा की जानी चाहिए और जैसा संतों ने समझा है कि शास्त्र जातपांत और