जातिप्रथा - उन्मूलन
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छुआछूत का समर्थन नहीं करते हैं। पहले प्रश्न के बारे में, मैं महात्मा से पूछना चाहता हूं कि इससे किसी को क्या लाभ या हानि होगी यदि गद्यांश अंतर्वेशित है और संतों द्वारा उनकी व्याख्या अलग - अलग की गई है। आम लोग असली मूलपाठ और अंतर्वेशित मूलपाठ में अंतर नहीं कर पाते हैं। आम लोग यह भी नहीं जानते कि शास्त्रों के मूलपाठ क्या है। वे इतने अनपढ़ हैं कि शास्त्रों में क्या लिखा है, यह भी नहीं जानते। जो उनसे कहा जाता है, वे उसी पर विश्वास कर लेते हैं, और उनसे कहा गया है कि शास्त्रों में जातपांत और छुआछूत की प्रथा को धार्मिक कर्तव्य माना गया है।
जहां तक संतों का प्रश्न है तो मानना पड़ेगा कि विद्वान लोगों की तुलना में संतों के उपदेश कितने ही अलग और उच्च हों, वे शोचनीय रूप से निष्प्रभावी रहे हैं। वे निष्प्रभावी दो कारणों से रहे हैं। पहला, किसी भी संत ने जाति - व्यवस्था पर कभी भी हमला नहीं किया। इसके विपरीत वे जातपांत की व्यवस्था के पक्के विश्वासी रहे हैं। उनमें से अधिकतर उसी जाति के होकर जिए और मरे जिस जाति के वे थे। ज्ञानदेव ब्राह्मण के रूप में अपनी प्रतिष्ठा से इतने उत्कट रूप से जुड़े हुए थे कि जब ब्राह्मणों ने उन्हें समाज में बने रहने से इन्कार कर दिया, तो उन्होंने ब्राह्मणों के पद की मान्यता पाने के लिए जमीन - आसमान एक कर दिया था और संत एकनाथ जो अछूतों को छूने तथा उनके साथ भोजन करने का साहस दिखाने के लिए धर्मात्मा बने हुए हैं, उन्होंने ऐसा इसलिए नहीं किया कि वे जातपांत और छुआछूत के विरुद्ध थे, जब कि उनकी मान्यता यह थी कि प्रदूषण को पवित्र गंगा नदी (अंत्याजाचा विटाल ज्यासी। गंगास्नाने शुद्धत्व न्यासी। ‘एकनाथी भागवत, अ.28, ओ 191) में स्नान कर धोया जा सकता है। जहां तक मेरा अध्ययन है किसी भी संत ने जातपांत और छुआछूत के विरुद्ध कोई अभियान नहीं चलाया। मनुष्यों के बीच चल रहे संघर्ष से वे चिंतित नहीं थे। वे मनुष्य और ईश्वर के बीच संबंध के लिए ही चिंतित थे। उन्होंने यह शिक्षा नहीं दी थी कि सारे मनुष्य बराबर हैं। यह एक बहुत अलग और बहुत अहानिकर प्रस्ताव है, जिसकी शिक्षा देने में किसी को काई परेशानी नहीं होगी या जिसके मानने में कोई खतरा नहीं है। दूसरा कारण यह है कि संतों की शिक्षा प्रभावहीन रही है, क्योंकि लोगों को पढ़ाया गया है कि संत जाति का बंधन तोड़ सकते हैं, लेकिन आम आदमी ये बंधन नहीं तोड़ सकता। इसलिए संत अनुसरण करने का उदाहरण नहीं बने। वह सम्मान योग्य धर्मपरायण व्यक्ति बने रहे। लोग जाति और छुआछूत में पक्का विश्वास करते हैं। यह दर्शाता है कि शास्त्रों की शिक्षाओं के विरुद्ध धर्मपरायण जीवन तथा आदर्शपूर्ण उपदेशों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। इस प्रकार इस बात से कोई सांत्वना नहीं मिलती कि संत थे या एक महात्मा है, जो शास्त्रों को थोड़े से विद्वानों और कई अज्ञानियों से अलग तरीके से समझते हैं। यह कि आम लोग शास्त्रों के बारे में गलत विचार रखते हैं, उसी तथ्य को ही ध्यान में रखना चाहिए और उसी को ध्यान में रखना पड़ेगा। शास्त्रों की सत्ता को समाप्त किए बिना और कैसा व्यवहार किया जाए, जो आज भी लोगों के आचरण को संचालित करते हैं, इस प्रश्न