102 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
पर महात्मा ने विचार नहीं किया है। लेकिन शास्त्रों की जकड़ से मुक्त कराने की जो भी प्रभावशाली योजना महात्मा बताएं, उन्हें यह मानना चाहिए कि किसी संत के धर्मपरायण जीवन से यह स्वयं ऊंचे उठ सकते हैं लेकिन आम आदमी की संत और महात्माओं के प्रति यही मनोवृत्ति है कि वे उनका सम्मान करते हैं, लेकिन अनुसरण नहीं करते। इससे कोई कुछ अधिक नहीं कर सकता।
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तीसरा प्रश्न महात्मा ने उठाया है कि चैतन्य, ज्ञानदेव, तुकाराम, तिरुवल्लूवर, रामकृष्ण परमहंस इत्यादि द्वारा ज्ञापित धर्म गुण रहित नहीं हो सकता, जैसा कि मैंने बताया है, और यह कि किसी भी धर्म को सबसे खराब नमूने से नहीं, बल्कि सबसे अच्छे परिणाम से परखना होगा। मैं इस वक्तव्य के प्रत्येक शब्द से सहमत हूं। लेकिन मैं बिल्कुल नहीं समझ पाया कि महात्मा इससे क्या सिद्ध करना चाहते हैं। यह सत्य है कि धर्म को सबसे खराब नमूने से नहीं, बल्कि सबसे अच्छे से परखना चाहिए, लेकिन क्या मामला यहीं समाप्त हो जाता है? मैं कहता हूं - नहीं। प्रश्न अभी भी उठता है कि सबसे खराब इतने अधिक क्यों हैं और सबसे अच्छे इतने थोड़े से क्यों? मेरे दिमाग से इसके दो कल्पनीय उत्तर हैं : (1) कुछ अपने मूल दुराग्रह के कारण सबसे खराब हैं, जो नैतिक रूप से शिक्षणीय नहीं हैं, इसलिए धर्म के आदर्श के दूर - दूर तक पहुंचने में अक्षम हैं, या (2) धर्म का आदर्श पूरी तरह गलत आदर्श है, जिसने अधिकतर लोगों के जीवन में गलत नैतिक मोड़ दिया है और गलत आदर्श के बावजूद सबसे अच्छे लोग बने रहे - वास्तव में गलत मोड को सही दिशा की ओर मोड़ दिया है। इन दो स्पष्टीकरणों में से मैं पहले को मानने के लिए तैयार नहीं हूं और मुझे विश्वास है कि महात्मा भी इसके विपरीत जाने को जोर नहीं देंगे। मेरे विचार में दूसरा स्पष्टीकरण ही तर्कपूर्ण और उचित हैं, जब तक कि महात्मा के पास कोई तीसरा विकल्प यह समझाने के लिए न हो कि सबसे खराब इतने अधिक क्यों हैं और सबसे अच्छे इतने थोड़े से क्यों हैं। यदि दूसरा स्पष्टीकरण ही एकमात्र स्पष्टीकरण है, तब स्पष्ट रूप से महात्मा का यह कथन कि धर्म की परख उससे सबसे अच्छे मानने वालों से होती है, हमको कहीं नहीं ले जाता है, सिवाय इसके कि उन बहुत से लोगों पर दया आती है जो गलत हो गए हैं, क्योंकि वे गलत आदर्शों की पूजा करने को बाध्य हैं।
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महात्मा ने तर्क दिया है कि यदि संतों के उदाहरण को अपनाएं तो हिन्दू धर्म सहनीय हो जाएगा। * महात्मा का यह तर्क भी अन्य कारण से गलत सिद्ध होता है। चैतन्य जैसे सुविख्यात संत का नाम लेकर मोटे और सबसे सरल तरीके से महात्मा सुझाव देना चाहते
* इस संबंध में श्री एच.एन.बेल्सफोर द्वारा लिखित भव्य लेख मोरालिटी एंड द सोशल स्ट्रकचर (नैतिकता एवं सामाजिक संरचना) देखें, जो अप्रैल, 1936 के ‘आर्य पथ‘ में प्रकाशित हुआ है।