जातिप्रथा - उन्मूलन 103
हैं कि ढांचे में मूलभूत परिवर्तन किए बिना हिन्दू समाज सहनीय और खुशहाल हो सकता है, यदि बड़ी जाति के हिन्दुओं को इस बात के लिए राजी किया जाए कि वे छोटी जाति के हिन्दू से व्यवहार करते समय उच्च स्तर की नैतिकता अपनाएंगे। मैं इस विचारधारा का पूरी तरह विरोधी हूं। मैं उस बड़ी जाति के हिन्दू का सम्मान करता हूं, जो अपने जीवन में उच्च सामाजिक आदर्श अपनाने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों के बिना भारत में रहना आज से भी अधिक भद्दा और कम खुशहाल होगा। फिर भी, जो इस बात पर निर्भर हैं कि वह बड़ी जाति के हिन्दू को एक अच्छा इंसान बनाएंगे तथा व्यक्ति चरित्र सुधारेंगे, वह मेरे विचार से अपनी शक्ति बरबाद कर रहा है और एक भ्रम पाले हुए है। क्या व्यक्तिगत चरित्र शस्त्र बनाने वाले को एक अच्छा आदमी बना सकता है, अर्थात् जो आदमी गोला बेचता हो, वह ऐसा गोला बनाए जो न फटे और गैस जहर न फैलाएं? अगर ऐसा नहीं हो सकता तो आप कैसे मान सकते हैं कि जाति की चेतना से भरा व्यक्ति अपने व्यक्तिगत चरित्र के कारण अच्छा व्यक्ति हो सकता है, अर्थात् वह व्यक्ति अपने साथियों के साथ मित्रता तथा समान व्यवहार कैसे करेगा? सच बात यह है कि वह अपने साथियों को जाति के आधार पर ऊंच और नीच मानेगा, किसी भी हालत में वह अपनी जाति वालों से जैसा बर्ताव करेगा, वैसा दूसरों से नहीं करेगा। उससे यह आशा नहीं की जा सकती है कि वह अपने साथियों के साथ रिस्तेदारों जैसा बर्ताव करेगा और उन्हें समान मानेगा। सच बात तो यह है कि हिन्दू अपनी जाति के बाहर वाले व्यक्ति को पराया मानता है, उसके साथ भेदभाव करके भी दंड मुक्त रह सकता है और बिना शर्म किए उसके साथ धोखा कर सकता है या दाव - पेंच खेल सकता है। कहने का मतलब है कि बेहतर और बदतर हिन्दू मिल सकता है। लेकिन एक अच्छा हिन्दू नहीं मिल सकता। ऐसा इसलिए नहीं है कि उसके व्यक्तिगत चरित्र में कोई कमी है। असल में, अपने साथियों के साथ उसके संबंधों का आधार ही गलत है। सबसे अच्छा आदमी भी सदाचारी नहीं माना जा सकता, अगर उसका उसके साथियों के साथ संबंधों का आधार ही मूलभूत रूप से गलत है। एक गुलाम के लिए उसका मालिक बेहतर या बदतर हो सकता है। लेकिन मालिक अच्छा नहीं हो सकता। अच्छा आदमी मालिक नहीं हो सकता और मालिक अच्छा आदमी नहीं हो सकता। यही ऊंची जाति और नीची जाति के संबंधों के बीच लागू होता है। अन्य ऊंची जातियों के लोगों की तुलना में नीची जाति के व्यक्ति के लिए ऊंची जाति का आदमी बेहतर या बदतर हो सकता है। ऊंची जाति का व्यक्ति अच्छा नहीं हो सकता, जब तक उसके पास ऊंची जाति का भेद करने के लिए छोटी जाति मौजूद है। छोटी जाति के लिए यह अच्छा नहीं है कि उसकी चेतना में यह बात बैठी है कि उसके ऊपर बड़ी जाति है। मैंने अपने भाषण में दलील दी थी कि वर्ण और जाति पर आधारित समाज एक ऐसा समाज है जो गलत संबंधों पर आधारित है। मैंने आशा की थी कि महात्मा मेरी दलीलों को नष्ट कर देंगे। लेकिन ऐसा करने की बजाए उन्होंने पृष्ठभूमि बताए बिना केवल चातुर्वर्ण्य में अपना विश्वास दोहराया है।