104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
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महात्मा जी उपदेश देते हैं, क्या उसी के अनुसार आचरण करते हैं? जिस बहस का व्यापक रूप में प्रयोग होता है, उसमें व्यक्तिगत उल्लेख पसंद नहीं किया जाता है। लेकिन जब कोई किसी सिद्धांत का उपदेश देता है और धर्म सिद्धांत मानकर उसे धारण कर लेता है तो यह उत्सुकता पैदा होती है कि वह जो उपदेश देता, उस पर कितना आचरण करता है। हो सकता है कि आचरण करने में असफलता का कारण यह हो कि आदर्श इतना अधिक ऊंचा हैं कि उसे प्राप्त करना संभव नहीं है। आचरण करने में असफलता का कारण व्यक्ति का अंतर्जातीय पाखंड भी हो सकता है। किसी भी स्थिति में उन्होंने अपने आचरण को परीक्षण के लिए खोलकर रख दिया है और मुझे दोष नहीं दिया जाना चाहिए, यदि मैं पूछूं कि अपने आदर्श को उन्होंने अपने जीवन में उतारने के लिए कितना प्रयास किया है। महात्मा जन्म से बनिया है। उनके पूर्वजों ने मंत्री - पद पाने के लिए व्यापार करना छोड़ दिया था, जो कि ब्राह्मण का पेशा है। अपने जीवन में महात्मा बनने से पहले, जब पेशा चुनने का अवसर आया तो उन्होंने तराजू की बजाए वकालत को प्राथमिकता दी। वकालत का परित्याग कर वह आधे संत और आधे राजनीतिज्ञ बन गए। उन्होंने व्यापार को कभी छुआ तक नहीं, जो उनका पैतृक पेशा है। उनका सबसे छोटा पुत्र - मैं केवल उस पुत्र की बात कर रहा हूं, जो अपने पिता का अनुयायी है - जो वैश्य के घर में जन्मा, लेकिन उसने एक ब्राह्मण लड़की से विवाह किया तथा जिसने एक बड़े पूंजीपति के समाचार - पत्र में नौकरी को चुना है। ऐसी जानकारी नहीं है कि महात्मा ने पैतृक पेशा न अपनाने के लिए उसकी कभी निंदा की हो। किसी आदर्श को उसके सबसे खराब नमूने से परखना गलत होगा और यह उदारता नहीं होगी। लेकिन निःसंदेह महात्मा के पास इससे बेहतर नमूना नहीं है और यदि वह इस आदर्श को अपनाने में असफल होते हैं तो यह आदर्श एक असंभव आदर्श है, जो आदमी की व्यावहारिक मूल प्रवृत्तियों के बिल्कुल विपरीत है। कार्लाइल के विद्यार्थी जानते हैं कि किसी विषय पर सोचने से पहले वे उस पर बोलते थे। क्या जातपांत के मामले में महात्मा के साथ ऐसा तो नहीं हुआ होगा। अन्यथा जो प्रश्न मेरे मन में आते हैं, वे उनसे छूटे नहीं होते। कोई भी पेशा कब पैतृक पेशा बन जाता है, जिसे अपनाना आदमी के लिए बाध्यकारी हो जाए? क्या व्यक्ति को अपना पैतृक पेशा ही अपनाना चाहिए, चाहे वह क्षमता के अनुकूल और लाभकारी नहीं हो? क्या आदमी को अपना पैतृक पेशा ही अपनाना चाहिए, वह अनैतिक पेशा ही क्यों न हो? यदि प्रत्येक को अपना पैतृक पेशा ही जारी रखना पड़े, तो इसका अर्थ होगा कि किसी आदमी को दलाल का पेशा इसलिए जारी रखना पड़ेगा, क्योंकि उसके दादा दलाल थे और किसी औरत को इसलिए वेश्या का पेशा अपनाना पड़ेगा, क्योंकि उसकी दादी एक वेश्या थी। क्या महात्मा अपने सिद्धांत के इस तार्किक परिणाम को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं? मेरे लिए उनका पैतृक पेशा अपनाने का आदर्श न केवल असंभव, बल्कि अव्यावहारिक आदर्श भी है, उसके अलावा नैतिक रूप से भी यह अरक्षणी आदर्श है।