2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 122

जातिप्रथा - उन्मूलन 105

7

महात्मा जीवन भर ब्राह्मण बने रहने में महान उत्कर्ष देखते हैं। इस तथ्य को छोड़ भी दिया जाए तो ऐसे कई ब्राह्मण हैं, जो जीवन भर ब्राह्मण बने रहना नहीं चाहते। हम उन ब्राह्मणों के बारे में क्या कहें, जो अपनी पुरोहिताई का पैतृक पेशा अपना लेते हैं? क्या वे पैतृक पेशा अपनाने के सिद्धांत की वजह से ऐसा करते हैं, या गंदे आर्थिक लाभ के इरादे से ऐसा करते हैं? महात्मा इन प्रश्नों से चिंतित प्रतीत नहीं होते। वह इस बात से संतुष्ट हैं कि ‘‘सच्चे ब्राह्मण वे हैं, जो मुफ्त में उन्हें दी जा रही भिक्षा पर जीते हैं और जितना भी उनके पास आध्यात्मिक खजाना है, उसे वे मुफ्त में बांट रहे हैं।‘पुश्तैनी ब्राह्मण पुजारी महात्मा को आध्यात्मिक खजाना ढोते हुए प्रतीत होते हैं। लेकिन पुश्तैनी ब्राह्मण के अन्य चित्र भी खींचे जा सकते हैं। ब्राह्मण विष्णु का पुजारी हो सकता है, जो प्रेम के देवता हैं। वह शंकर का पुजारी भी हो सकता है, जो विनाश के देवता हैं। वह बुद्ध गया में भी पुजारी हो सकता है और बुद्ध की पूजा कर सकता है, जो मानवता के महानतम् शिक्षक हैं, जिन्होंने सबसे श्रेष्ठ सिद्धांत ‘प्रेम‘ का पाठ पढ़ाया है। वह ‘काली‘ का पुजारी भी हो सकता है, जो ऐसी देवी है जिसकी खून की प्यास बुझाने के लिए रोज एक पशु की बलि देनी पड़ती है, वह राम के मंदिर का पुजारी भी होगा, जो ‘क्षत्रिय‘ भगवान है। वह परशुराम के मंदिर का पुजारी भी हो सकता है जो ऐसा भगवान है, जिसने क्षत्रियों का नाश करने के लिए अवतार लिया था। वह ब्रह्मा का पुजारी भी हो सकता है, जिसने संसार की रचना की है। वह पीर का पुजारी भी हो सकता है, जिसका भगवान अल्ला संसार के ऊपर ब्रह्मा का आध्यात्मिक प्रभुत्व का दावा बरदाश्त नहीं करेगा। कोई यह नहीं कह सकता कि जीवन का यह चित्र सही नहीं है। अगर यह सही चित्र है तो कोई नहीं जानता कि उन देवताओं और देवियों के प्रति भक्ति को धारण करने के बारे में क्या कहा जाए कि उनके लक्षण इतने विरोधात्मक हैं कि कोई ईमानदार व्यक्ति उन सभी का भक्त नहीं हो सकता। हिन्दू लोग इस असाधारण तथ्य को अपने धर्म का महानतम सदगुण मानते हैं - जैसे कि इनकी उदारता, इनकी सहनशीलता की भावना। इस सहज दृष्टिकांण के विपरीत कहा जा सकता है कि सहनशीलता और उदारता वास्तव में उदासीन या शिथिल सिद्धांत निरपेक्षता के अलावा और अधिक प्रशंसनीय नहीं हैं। इन दो प्रवृत्तियों में बाहरी तौर पर भेद करना मुश्किल है। लेकिन अत्यावश्यक रूप से वास्तविक गुणों में ये इतने अधिक भिन्न हैं कि गहराई से जांच करने वाला एक - दूसरे को एक जैसा मानने की गलती नहीं कर सकता। यह कि एक व्यक्ति जो बहुत सारे देवी - देवताओं का सम्मान करता है, उसे सहनशीलता की भावना का सबूत माना जा सकता है, लेकिन क्या यह समय के साथ चलने की इच्छा से पैदा हुए पाखंड का सबूत नहीं है? मेरी पक्की धारणा है कि यह केवल पाखंड है। अगर यह दृष्टिकोण अच्छे आधार पर स्थापित है तो कोई पूछ सकता है कि उस व्यक्ति के पास कौन सा आध्यात्मिक खजाना है, जो किसी भी देवी - देवता की पूजा और आराधना करने के लिए तैयार है? न केवल ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक खजाने से दिवालिया हो गया है, बल्कि पुजारी के महान पेशे को बिना अस्था