2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 123

106 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

और बिना विश्वास के इसलिए अपनाता है, क्योंकि साधारणतः वह पैतृक पेशा है, जो एक मशीनी प्रक्रिया के अंतर्गत पीढ़ी दर पीढ़ी अपनाया गया है। एक सदगुणों का संरक्षण नहीं है, यह वास्तव में एक महान पेशे का दुरुपयोग है, जो धर्म की सेवा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

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महात्मा इस सिद्धांत से क्यों चिपके हुए हैं कि हर व्यक्ति को अपना पैतृक पेशा अपनाना चाहिए। उन्होंने इसका कारण कहीं नहीं बतलाया है। लेकिन कोई कारण तो होना चाहिए, यद्यपि उन्हें खुले आम कहने की चिंता नहीं है। वर्षों पहले उन्होंने अपने समाचार पत्र ‘यंग इंडिया‘ में जाति बनाम वर्ग विषय पर लिखते हुए कहा था कि जाति - व्यवस्था, वर्ण - व्यवस्था से बेहतर है, क्योंकि जाति द्वारा समाज में स्थिरता लाने के लिए सबसे उत्तम और संभव सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। यदि यही कारण है कि महात्मा इस विचार से चिपके हुए हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को पैतृक पेशा ही अपनाना चाहिए तो वे सामाजिक जीवन के मिथ्या विचार से चिपके हुए हैं। प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक स्थिरता चाहता है और व्यक्तियों और वर्गों के संबंधों में कुछ सामंजस्य स्थापित होना ही चाहिए, जिससे समाज में स्थिरता कायम हो सके। मेरा विश्वास है कि दो बातें कोई भी नहीं चाहता है। पहली बात जो कोई नहीं चाहता वह है निश्चल संबंध, कुछ ऐसा जिसे बदला न जा सके, कुछ ऐसा जो सार्वकालिक रूप से स्थिर रहे। स्थायित्व भी जरूरी है, लेकिन वह बदलाव की कीमत पर नहीं होना चाहिए, क्योंकि बदलाव अवश्यंभावी है। दूसरी बात जो कोई नहीं चाहता, वह है केवल सामंजस्य। सामंजस्य की भी आवश्यकता है, लेकिन वह सामाजिक न्याय की बलि देकर नहीं किया जाना चाहिए। क्या यह कहा जा सकता है कि जाति के आधार पर सामंजस्य अर्थात् अपने पैतृक व्यवसाय के आधार पर सामंजस्य होने से इन दो बुराइयों से बचना संभव है? मैं मानता हूं कि ऐसा नहीं है। मुझे कोई संदेह नहीं है कि सबसे अच्छे संभव सामंजस्य की बात तो दूर, यह सबसे खराब प्रकार का सामंजस्य है, क्योंकि यह सामाजिक सामंजस्य के दोनों सिद्धांतों जैसे धारा प्रवाहिकता और समानता का उल्लंघन करता है।

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कुछ लोग सोचते हैं कि महात्मा ने बहुत प्रगति की है, क्योंकि वह अब केवल वर्ण में विश्वास करते हैं और जाति मेंं विश्वास नहीं करते हैं। यह भी सत्य है कि एक समय था, जब महात्मा पूर्णरूप से कुलीन सनातनी हिन्दू थे। वह वेदों, उपनिषदों, पुराणों और जो भी हिन्दू ग्रंथ हैं, उनमें विश्वास करते थे। इसीलिए अवतारों और पुनर्जन्म में भी विश्वास करते थे। वह जाति में विश्वास करते थे और पूरी शक्ति से एक रूढि़वादी की तरह इसका समर्थन करते थे। उन्होंने सहभोज, सहपान और अंतर्जातीय विवाह की मांग की निंदा की थी और कहा था कि सहभोज का विरोध करना चाहिए, क्योंकि इससे बहुत हद