जातिप्रथा - उन्मूलन
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तक ‘‘इच्छा शक्ति पैदा करने और सामाजिक शुद्धता बनाए रखने में मदद मिलती है।‘‘ यह अच्छी बात है कि उन्होंने पाखंडपूर्ण मूर्खता का परित्याग कर दिया है और स्वीकार किया है कि ‘‘जातपांत आध्यात्मिक और राष्ट्रीय विकास, दोनों के लिए हानिप्रद है‘‘ और हो सकता है कि उनके पुत्र का जाति के बाहर विवाह इन्हीं विचारों के परिवर्तन की देन है। लेकिन क्या महात्मा ने वास्तव में प्रगति की है? वर्ण की प्रकृति क्या है, जिसे महात्मा मानते हैं। क्या वह यही वेदों की धारणा है, जिसे दयानंद सरस्वती और उनके अनुयायियों, आर्यसमाजियों ने प्रतिपादित किया है? वेद में वर्ण की धारणा का सारांश यह है कि व्यक्ति वह पेशा अपनाए, जो उसकी स्वाभाविक योग्यता के लिए उपयुक्त हो। महात्मा की वर्ण की धारणा का सार यह है कि व्यक्ति पैतृक पेशा ही अपनाए चाहे वह उसकी स्वाभाविक योग्यता के अनुरूप हो या न हो। जाति और वर्ण में क्या अंतर है, जो महात्मा ने समझा है। मैं कोई अंतर नहीं पाता हूं। जो परिभाषा महात्मा ने दी है उसमें मैं कोई अंतर नहीं पाता हूं। जो परिभाषा महात्मा ने दी है उसके अनुसार तो वर्ण ही जाति का दूसरा नाम है, इसका सीधा कारण यह है कि दोनों का सार एक है - अर्थात् पैतृक पेशा अपनाना, प्रगति करना तो दूर, महात्मा ने अवनति की है। वर्ण की वैदिक धारणा की व्याख्या करके उन्होंने जो उत्कृष्ट था उसे वास्तव में उपहासप्रद बना दिया है। यद्यपि मैं वैदिक वर्ण - व्यवस्था को अस्वीकार करता हूं, जिसका कारण मैंने अपने भाषण में बताया है। लेकिन मैं मानता हूं कि स्वामी दयानंद व कुछ अन्य लोगों ने वर्ण के वैदिक सिद्धांत की जो व्याख्या की है, बुद्धिमत्तापूर्ण है और घृणास्पद नहीं है। मैं यह व्याख्या नहीं मानता है कि जन्म किसी व्यक्ति का समाज में स्थान निश्चित करने का निर्धारक तत्व हो। वह केवल योग्यता को मान्यता देती है। वर्ण के बारे में महात्मा के विचार न केवल वैदिक वर्ण को मुर्खतापूर्ण बनाते हैं, बल्कि घृणास्पद भी बनाते हैं। वर्ण और जाति, दो अलग - अलग धारणाएं हैं। वर्ण इस सिद्धांत पर टिका हुआ है कि प्रत्येक को उसकी योग्यता के अनुसार, जब कि जाति का सिद्धांत है कि प्रत्येक को उसके जन्म के अनुसार। दोनों में इतना ही अंतर है, जिता
खडि़या और पनीर में। वास्तव में दोनो विपरीत हैं। अगर महात्मा विश्वास करते हैं, जो वह अवश्य करते हैं, कि प्रत्येक को अपना पैतृक पेशा अपनाना चाहिए, तो निश्चित रूप से जातपांत की वकालत कर रहे हैं तथा इसको वर्ण - व्यवस्था बताकर न केवल परिभाषिक झूठ बोल रहे है।, बल्कि बदतर और हैरान करने वाली भ्रांति फैला रहे हैं। मेरा मानना है कि सारी भ्रांति इस कारण से है कि महात्मा की धारणा निश्चित और स्पष्ट नहीं है कि वर्ण क्या है और जाति क्या है तथा हिन्दूवाद के संरक्षण के लिए इसमें से किसकी जरूरत है। उन्होंने कहा है और वह आशा करते हैं कि वह अपने विचार बदलने के लिए कोई रहस्यवादी कारण नहीं ढूंढेंगे कि जाति हिन्दू धर्म का सार नहीं है। क्या वे वर्ण को हिन्दू धर्म का सार मानते हैं? अभी भी कोई सुनिश्चित उत्तर नहीं दे सकता है। उनका लेख ‘डॉ. अम्बेडकर का अभ्यारोपण‘ पढ़ने वाले भी कहेंगे, ‘नहीं‘। अपने लेख में वह नहीं बताते कि वर्ण का धर्म सिद्धांत हिन्दूवादी पंथ का एक आवश्यक हिस्सा है। वर्ण को हिन्दू धर्म का सार बताने की बजाए, वह कहते हैं कि ‘‘हिन्दू धर्म का सार इस कथन में निहित