108 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
है कि एक ओर केवल एक सत्य ही ईश्वर है और अहिंसा मानव परिवार का एक कानून इसकी सुस्पष्ट स्वीकृति है।‘‘ लेकिन श्री संत राम के पत्र के उत्तर में लिखे लेख के पढ़ने वाले ‘हां‘ कहेंगे। उस लेख में उन्होंने कहा है कि एक मुसलमान कैसे मुसलमान रह सकता है यदि वह कुरान को अस्वीकार करता है, या एक ईसाई कैसे ईसाई रह सकता है यदि वह बाइबल को अस्वीकार करता है? यदि जाति और वर्ण विनिमय शब्द है और यदि वर्ण शास्त्रों का अंगभूत भाग है जो हिन्दू धर्म को परिभाषित करता है, तो मैं नहीं जानता कि जाति, अर्थात् वर्ण को अस्वीकार करने वाला अपने आपको हिन्दू कैसे कहलवा सकता है।‘‘ फिर यह छलकपट क्यों? महात्मा हिचकिचा क्यों रहे हैं? वह किसको प्रसन्न करना चाहते हैं? क्या संत सत्य का अर्थ समझने में असफल हो गए हैं? या क्या राजनीतिज्ञ संत के रास्ते में रोड़ा बन रहे हैं, महात्मा की भ्रांति का वास्तविक कारण क्या इन दो साधनों से पता लगाया जा सकता है? पहला है, महात्मा का स्वभाव। वह प्रत्येक बात में बच्चे जैसी सरलता और बच्चे जैसा स्वयं को धोखा देने वाला स्वभाव रखते हैं। बच्चे की तरह वह किसी भी बात में जिसे वह चाहते हैं, विश्वास करने लगते हैं। इसलिए हमें प्रतीक्षा करनी चाहिए कि उन्होंने जिस तरह जाति में विश्वास करना छोड़ दिया है, उसी तरह वे वर्ण में विश्वास करना छोड़ देंगे। दूसरा साधन उनकी महात्मा और राजनीतिज्ञ की दोहरी भूमिका है। महात्मा के रूप में वह शायद राजनीति का आध्यात्मीकरण करने को कोशिश कर रहे हैं। इसमें वह सफल हुए हों या न हुए हों, राजनीति ने उनका व्यापारीकरण कर दिया है।
राजनीतिज्ञ को यह जानना जरूरी है कि समाज पूर्ण सत्य को सहन नहीं कर सकता और उन्हें पूर्ण सत्य नहीं बोलना चाहिए। अगर वह पूर्ण सत्य बोल रहे हैं तो यह उनकी राजनीति के लिए खराब होगा। महात्मा जाति और वर्ण का समर्थन हमेशा क्यों कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि यदि उन्होंने इसका विरोध किया तो वे राजनीति में अपना स्थान
खो देंगे। उनकी भ्रांति का कोई भी कारण हो, महात्मा को यह कह दिया जाना चाहिए कि वह अपने आपको धोखा दे रहे हैं तथा वर्ण के नाम पर जाति को उपदेश देकर लोगों को धोखा दे रहे हैं।
10
महात्मा कहते हैं कि हिन्दू और हिन्दू धर्म की जांच करने के लिए जो मानक मैंने अपनाए हैं, उन मानकों के आधार पर प्रत्येक वर्तमान धर्म शायद असफल हो जाएगा। यह शिकायत हो सकती है कि मेरे मानक ऊंचे हैं और यह सच हो सकता है। लेकिन प्रश्न यह नहीं है कि ये मानक ऊंचे हैं या नीचे हैं। प्रश्न यह है कि यह मानक लागू करने के लिए उचित हैं या नहीं। किसी अन्य मानक को कोई अर्थ नहीं है, अगर यह माना जाए कि धर्म आवश्यक रूप से लोगों के कल्याण के लिए होता है। अब मैं कहता हूं कि हिन्दू तथा हिन्दू धर्म को जांचने के लिए जो मानक मैंने लागू किए हैं, वे सबसे अधिक उपयुक्त हैं और इससे बेहतर मानक नहीं जानता हूं। यह निष्कर्ष सत्य हो सकता है कि यदि मेरे मानक लागू किए