महाराष्ट्रः एक भाषावार प्रांत
भाग I
भाषावार प्रांतों के निर्माण की समस्या
भाषा के आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन के सवाल से न केवल दलीय पूर्वाग्रहों और दलीय
हितों से उत्पन्न अनेक प्रकार के वाद - विवाद उभर कर सामने आए हैं वरन् भाषावार प्रांतों
के गठन की उपयोगिता के बारे में भी मतभेद दिखाई देता है। वाद - विवाद के मुख्य मुद्दों
में ये बातें सम्मिलित हैं : परस्पर सटे हुए इलाकों के बारे में दावे या प्रति दावे संबंधी दो
पड़ोसी प्रांतों के बीच झगड़े तथा उन इलाकों को किसी प्रांत में सम्मिलित करने संबंधी
शर्तें। जहां तक ये दोनों मुद्दे महाराष्ट्र प्रांत के पुनर्गठन से संबंधित हैं, मैं इन पर अपने
विचार आगे चलकर व्यक्त करूंगा। पहले मैं भाषावार प्रांतों के पुनर्गठन के प्रस्ताव के
गुण - दोषों को लेता हूं।
भाषावार प्रांतों के पुनर्गठन की मांग का प्रयोजन
- भाषावार प्रांतों के पुनर्गठन की मांग का प्रयोजन क्या है? जो लागे भाषावार
प्रांतों के निर्माण के समर्थक हैं, उनकी मान्यताओं का सार यह है कि प्रांतों की भाषाएं और
संस्कृतियां अलग - अलग होती है। इसलिए उन्हें इस बात की खुली छूट होनी चाहिए कि
वे अपनी - अपनी भाषाओं और संस्कृतियों का विकास कर सकें। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक प्रांत
में विशिष्ट राष्ट्रीयता के सभी तत्व विद्यमान होते हैं और उन प्रांतों को इस बात की पूरी
स्वतंत्रता दी जानी चाहिए, जिससे वे अपने - अपने राष्ट्रत्व का पूर्णतः विकास कर सकें।
| Col1 |
jk"VªRo dk dfBukb;k |
Col3 |
Col4 |
|
|
|
|
|
|
|
|
भाषावार प्रांतों के निर्माण से उत्पन्न होने वाली कठिनाइयां
- इस प्रकार के भाषावार प्रांतों के निर्माण के प्रश्न पर विचार करते समय यदि इस
तथ्य को नजरअंदाज कर दिया जाता है कि भावी भारत सरकार का ढांचा द्विरूपी होगा,
तो ऐसा करना अदूरदर्शिता पूर्ण होगा। द्विरूपी ढांचा इस प्रकार होगा : (क) केंद्र सरकार
और (ख) अनेक प्रांतीय सरकारें, जो अपने - अपने विधायी कार्यपालक और प्रशासनिक
प्रकार्यों के निर्वाह में जटिल रूप से मिश्रित और परस्पर संबंधित होंगी। इसलिए भाषावार
प्रांतों के निर्माण के विचार से सहमत होने के पहले हमेंं इस बात पर विचार कर लेना
चाहिए कि केंद्र सरकार के कार्यकलाप पर भाषावार प्रांतों का क्या प्रभाव पड़ेगा?