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महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत

भाषावार प्रांतों के निर्माण से लाभ

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  1. यद्यपि इस बात में सच्चाई है कि भाषावार प्रांतों के पुनर्गठन के प्रस्ताव से ऐसी समस उठ खड़ी होगी, जो भारत की एकता जैसी मूलभूत बात को खोखला कर सकने की संभावना अपने में संजोए हुए है, फिर भी इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं है कि भाषाओं के आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन के अपने कुछ निश्चित राजनीतिक लाभ भी हैं।

  2. भाषावार प्रांतों की योजना का जो मुख्य लाभ मुझे सबसे अधिक प्रभावित करता है, वह यह है कि मिश्रित भाषायी प्रांतों की तुलना में भाषावार प्रांतों में लोकतंत्र अधिक कारगर सिद्ध होगा। भाषावार प्रांत लोकतंत्र की प्रधान आवश्यकता तथा सामाजिक समरूपता की पूर्ति करता है। किसी समाज की समरूपता जिन बातों पर आश्रित होती है, वे हैं : लोगों का इस बात में विश्वास कि उन सबका उद्भव एक ही मूल से हुआ है, उन सबकी भाषा और साहित्य एक हो, वे सब एक ही ऐतिहासिक परंपरा पर गर्व करते हों, उन सबके सामाजिक रीति - रिवाज मिले - जुले हों, आदि - आदि। समरूपता संबंधी इन तर्कों के बारे में समाजशास्त्र के अध्येताओं में किसी प्रकार का विवाद या मतभेद नहीं है। यदि किसी राज्य में सामाजिक समरूपता का अभाव हो तो ऐसी स्थिति खतरनाक होगी, विशेषकर तब, जब वह राज्य लोकतांत्रिक ढांचे पर बना हो। इतिहास हमें यह बताता है कि जिस राज्य की जनता में समरूपता नहीं मिलती, वहां लोकतंत्र असफल हो जाता है। ऐसे विषम समाज में, जो वर्गों में बंटा हो और जिसके सभी वर्ग एक - दूसरे के प्रति आक्रामक और गैर - सामाजिक रुख रखते हों उस समाज में लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता। उलटे, उसमें भेदभाव, अवहेलना और अनुचित पक्षपात पनपेगा तथा जिस वर्ग के हाथ में राजनीतिक सत्ता होगी, वह दूसरे वर्ग के हितों को दबाने की चेष्टा करेगा। किसी भी विषम समाज में लोकतंत्र की असफलता का मुख्य कारण यही है कि सत्ता का उपयोग पक्षपात रहित तथा गुणावगुण को ध्यान में रखते हुए ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय‘ न होकर किसी वर्ग विशेष की ऐश्वर्य या शक्ति वृद्धि हेतु और अन्य वर्ग या वर्गों को क्षति पहुंचाने के लिए किया जाता है। इसके विपरीत, जिस राज्य की जनता में जितनी अधिक समरूपता होगी, वह राज्य लोकतंत्र के वास्तविक उद्देश्यों की प्राप्ति मेंं उतना ही अधिक तल्लीन रहेगा, क्योंकि उस राज्य में राजनीतिक सत्ता के दुरुपयोग को बढ़ावा देने वाले कृत्रिम अवरोध या सामाजिक वैमनस्य पैदा करने वाले तत्व उपस्थित नहीं होंगे।

  3. सार यह है कि लोकतंत्र की समुचित क्रियाशीलता के लिए यह आवश्यक है कि उस राज्य की समस्त जनता का वितरण इस प्रकार का हो कि वह एक ठोस समरूपी इकाई लगे। भारत के सभी प्रांतों का जो पुनर्गठन प्रस्तावित है, उसके मूल में इसी तरह के लोकतंत्रात्मक शासन की भावना निहित है। संक्षेप में, किसी भी प्रांत के लोकतंत्र की सफलता के लिए उसकी जनता का समरूपी होना अनिवार्य है। दूसरे शब्दों में, लोकतांत्रिक सांचे में ठीक प्रकार से सामने के लिए हर प्रांत को एक भाषायी इकाई होना चाहिए। भाषावार प्रांतों के निर्माण का औचित्य यही जान पड़ता है।