118 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
क्या भाषावार प्रांतों का निर्माण स्थगित किया जा सकता है ?
- क्या इस समस्या के समाधान को टाला जा सकता है? इस प्रसंग में मैं आयोग के समक्ष विचारार्थ कुछ बातें रखना चाहूंगा :
(क) भाषावार प्रांतों की मांग नई नहीं है। इस समय के छह प्रांत भाषावार प्रांत ही
हैं, ये हैं : (1) पूर्वी पंजाब, (2) संयुक्त प्रांत, (3) बिहार, (4) पश्चिमी बंगाल,
(5) असम, और (6) उड़ीसा। भाषायी आधार पर पुनर्गठन की के गठन का
सिद्धांत की सुगबुगाहट जिन प्रांतों में सुनाई पड़ रही है, वे हैं : (1) बंबई, (2)
मद्रास, और (3) मध्य भारत। जब छह प्रांतों के बारे में भाषा के आधार पर
प्रांतों के गठन का सिद्धांत मान लिया गया है तो फिर जो अन्य प्रांत इसी
सिद्धांत को उन पर भी लागू करने की मांग कर रहे हैं, उनकी इस मांग को
अनंतकाल के लिए टाला तो नहीं जा सकता।
(ख) इन गैर - भाषावार प्रांतों की स्थिति इस समय खतरनाक नहीं तो कम से कम
उत्तेजनापूर्ण तो कही ही जा सकती है। यह स्थिति ठीक वैसी ही हो गई हैं,
जैसी कभी प्राचीन तुर्की साम्राज्य या प्राचीन ऑस्ट्रो - हंगेरियाई साम्राज्य की
थी।
(ग) भाषावार प्रांतों के निर्माण की मांग यहां भी ठीक उसी पलीते जैसी विस्फोटक हो
गई है, जिसने प्राचीन तुर्की साम्राज्य या ऑस्ट्रो हंगेरियाई साम्राज्य को जलाकर
राख कर दिया था। इस आग को और अधिक भड़कने से बचाना होगा, नहीं
तो सर्वनाश को रोक पाना कठिन हो जाएगा।
(घ) जब तक प्रांतों का ढांचा लोकतंत्रात्मक नहीं था और जब तक नए संविधान
के तहत उन्हें व्यापक प्रभुत्व संपन्न अधिकार नहीं मिले हुए थे, तब तक तो
भाषावार प्रांतों के पुनर्गठन की अत्यावश्यकता महसूस नहीं की जा रही थी।
किन्तु नए संविधान के बन जाने पर अब इस समस्या का अविलंब समाधान
ढूंढना अनिवार्य हो गया है।
कठिनाइयों का हल
- यदि समस्या का निपटारा शीघ्र ही किया जाना है तो इसका हल क्या है? जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, यह हल दो शर्तों को पूरा करने वाला होना चाहिए। भाषावार प्रांतों के पुनर्गठन के सिद्धांत को स्वीकार कर लेने के बाद भी ऐसी व्यवस्था करनी होगी, ताकि भारत की एकता खंडित न होने पाए। इसलिए इस समस्या के समाधान हेतु मेरा सुझाव है कि भाषा के आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन की मांग को स्वीकार कर लेने पर भी ऐसी संवैधानिक व्यवस्था हो कि केंद्र सरकार की जो राजभाषा हो, वहीं भाषा सभी प्रांतों की भी राजभाषा मानी जाए। केवल इसी आधार पर मैं भाषावार प्रांतों की मांग को मानने के लिए तत्पर हूं।