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महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत

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  1. मैं इस तथ्य को जानता और मानता हूं कि मेरा यह सुझाव भाषावार प्रांतों की प्रचलित अवधारणा के प्रतिकूल जाता है। आज की मान्य अवधारणा यह है कि प्रांतीय भाषा ही उस प्रांत की राजभाषा होगी। मैं भाषावार प्रांतों के निर्माण के खिलाफ नहीं हूं। किन्तु मुझे इस बात से कड़ी आपत्ति है कि केंद्र की राजभाषा से भिन्न होने के बावजूद भी प्रांतीय भाषा को वहां की राजभाषा बनाया जाए। मेरी यह आपत्ति निम्नलिखित कारणों से है :

(क) भाषावार प्रांत बनाए जाएं, इस विचार का संबंध कतई इस बात से नहीं है कि

उस प्रांत की राजभाषा क्या हो। मेरे मतानुसार भाषावार प्रांत से तात्पर्य एक ऐसे

प्रांत से है, जिसकी जनता अपनी सामाजिक संरचना में समरूपी हो। ऐसा होने

पर उसकी लोकतंत्रात्मक सरकार को जिन सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति करनी

चाहिए, उनके लिए वह अधिक उपयुक्त होगी। मेरे विचार से, भाषावार प्रांत का

उस प्रांत की भाषा से कोई लेना - देना नहीं है। भाषावार प्रांतों की योजना में

वहां की भाषा की भूमिका अनिवार्यतः महत्वपूर्ण है। किन्तु यह भूमिका प्रांत के

निर्माण तक ही सीमित रखी जा सकती है, अर्थात् इसका उपयोग उस प्रांत की

सीमाओं के रेखांकन तक ही किया जाना चाहिए। भाषावार प्रांतों की योजना

में ऐसी कोई दो - टूक अनिवार्यता नहीं है, जो हमारे लिए उस प्रांतीय भाषा को

वहां की राजभाषा भी बनाने के लिए बाध्यकारी हो। उस प्रांत की सांस्कृतिक

एकता बनाए रखने के लिए न ही यह जरूरी है कि उस प्रांत की भाषा को

ही वहां की राजभाषा बनाया जाए। ऐसा मानना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि

प्रांत की सांस्कृतिक एकता तो पहले से ही विद्यमान है और उस एकता को

अन्य भाषेतर कारकों, जैसे समान ऐतिहासिक परंपरा, सामाजिक रीति - रिवाजों

में समानता आदि से भी बनाए रखा जा सकता है। पहले से विद्यमान प्रांत की

सांस्कृतिक एकता को स्थिर रखने के लिए यह आवश्यक नहीं जान पड़ता कि

प्रांतीय भाषा को सरकारी प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया ही जाए। प्रांतीयता के

हिमायतियों के सौभाग्य से इस बात का डर नहीं है कि यदि कोई महाराष्ट्रीय

अन्य भाषा भी बोलता है तो वह महाराष्ट्रीय नहीं रहेगा। इसी तरह यदि कोई

तमिल या कोई आंध्रवासी या कोई बंगाली अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त किसी

अन्य भाषा का भी प्रयोग करता है तो इस बात का डर नहीं है कि वह तमिल,

आंध्रवासी या बंगाली नहीं माना जाएगा।

(ख) भाषावार प्रांतों के लिए एड़ी - चोटी का जोर लगाने वाले हिमायती भी निश्चय

ही यह कहकर आपत्ति प्रकट करेंगे कि वे भी नहीं चाहते कि प्रांतों को अलग -

अलग राष्ट्रों के रूप में बदल दिया जाए। उनकी नेकनीयती पर अविश्वास नहीं

किया जाना चाहिए। फिर भी, यह तो मानना ही पड़ेगा कि कभी - कभी हालात

इतने बिगड़ जाते हैं, जिनकी पूर्वकल्पना उनके प्रणेताओं ने भी न की होगी।

इसलिए यह परमावश्यक जान पड़ता है कि शुरू से ही कदम फूंक - फूंककर

ही उठाए जाएं, ताकि आगे चलकर बुरे दिन देखने की नौबत ही न आने पाए।

इसलिए इस बात में किसी तरह की बुराई नजर नहीं आती कि यदि रस्सी को