120 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
एक ओर ढील देनी हो तो दूसरी ओर कसकर बांध लेना चाहिए।
(ग) हमें प्रांतीय भाषा को वहां की राजभाषा नहीं बनने देना चाहिए, चाहे यह सहज
लगता हो कि प्रांतीय भाषा उस प्रांत की राजभाषा होनी चाहिए। भाषावार प्रांतों
के निर्माण में कुछ भी खतरा नहीं है। खतरा है तो केवल तब, जब भाषावार प्रांत
बनाए जाएं और साथ - साथ प्रत्येक प्रांतीय भाषा को भी वहां की राजभाषा बना
दिया जाए। प्रांतीय भाषाओं को राजभाषाएं बना देने से प्रांतीय राष्ट्रिकताओं के
विकास का रास्ता साफ हो जाएगा, क्योंकि प्रांतीय भाषाओं के राजभाषाएं बन
जाने का परिणाम यह होगा कि प्रांतीय संस्कृतियां अलग - थलग पड़ जाएंगी,
तब उनका स्वरूप अलग से झलकने लगेगा और ऐसा होने पर उनमें कठोरता
और ठोस हो जाएगी। ऐसा होने देना विनाशकारी होगा। इसका तात्पर्य प्रांतों
को स्वतंत्र राष्ट्रों के रूप में विकसित होने देने का न्यौता देना होगा - हर मामले
में स्वतंत्र या अलग - अलग। और इस प्रकार एकीकृत भारत के सर्वनाश का
रास्ता खुल जाएगा। भाषावार प्रांतों के निर्माण के बावजूद वहां की भाषाओं को
राजभाषाओं का दर्जा न दिए जाने पर प्रांतीय संस्कृतियां प्रवाहित रहेंगी और
सभी के बीच आदान - प्रदान की धाराएं बहती रहेंगी। इसलिए हर हालत में हमें
प्रांतीय भाषाओं को भाषावार प्रांतों की राजभाषाएं नहीं बनने देना है।
- किसी अखिल भारतीय राजभाषा को, जो हो सकता है कि उस प्रांत की भाषा से भिन्न हो, किसी भाषावार प्रांत पर थोपने की बात उस प्रांत की संस्कृति को बनाए रखने के आड़े नहीं आएगी। राजभाषा का प्रयोग तो सरकारी प्रयोजनों के लिए ही होगा। इससे इतर जितने भी अन्य गैर - सरकारी क्षेत्र हैं और जिन्हें पूरी तरह सांस्कृतिक क्षेत्र माना जा सकता है, उनमें प्रांतीय भाषाओं को अपनी भूमिका निभाने का अवसर मिलता रहेगा। इस तरह सरकारी भाषा और गैर - सरकारी भाषाओं के बीच स्वस्थ प्रतियोगिता चलती रहेगी। हो सकता है कि दोनों में से एक भाषा दूसरी भाषा को अपदस्थ करने का प्रयास करे। यदि सरकारी भाषा गैर - सरकारी भाषा को सांस्कृतिक क्षेत्र से बाहर करने में सफल हो जाती है तो इससे बढ़कर और क्या बात होगी। यदि वह सफल नहीं भी होती है तो कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा। ऐसी स्थिति को असहनीय भी नहीं माना जा सकता। कम से कम वर्तमान स्थिति की तुलना में तो वह अधिक असहनीय नहीं ही होगी, क्योंकि आज की स्थिति ऐसी है, जिसमें अंग्रेजी सरकारी भाषा है और प्रांतीय भाषाएं गैर - सरकारी भाषाएं। बस इतना भर अंतर होगा कि तब अंग्रेजी राजभाषा नहीं होगी, कोई अन्य भाषा उसका स्थान ले लेगी।
संतोषप्रद हल की आवश्यकताएं
- मैं यह जानता हूं कि मैं जो हल सुझा रहा हूं, वह कोई आदर्श हल नहीं है। पर