महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत
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इस हल से प्रांतों में संवैधानिक कार्य लोकतंत्रात्मक पद्धति पर चलना संभव हो सकेगा। किन्तु इससे केंद्र के स्तर पर ऐसा संभव नहीं होगा। इसका कारण यह है कि केवल भाषायी एकता, अर्थात् एक ही भाषा बोलने की सुविधा से समरूपता सुनिश्चित नहीं हो जाती, क्योंकि समरूपता तो अन्य अनेक कारकों का परिणाम होती है। ऊपर कहा ही जा चुका है कि केंद्रीय सभा के लिए जो प्रतिनिधि इन प्रांतों से चुने जाएंगे, उनकी पहचान पूर्ववत् ही रहेगी, अर्थात् वे बंगाली, तमिल, आंध्रवासी, महाराष्ट्रीय आदि ही रहेंगे, फिर चाहे वहां वे अपनी मातृभाषा के स्थान पर राजभाषा का ही प्रयोग क्यों न करने लगे हों। तुरंत लागू किया जा सकने वाला आदर्श हल इस समय मुझे नहीं सूझ रहा है। इसलिए हमेंं अगले संभावित सर्वोत्तम हल से ही संतोष करना होगा। हां, ऐसा करते समय हमें यह जरूर देख लेना चाहिए कि हम जिस तात्कालिक हल को अपनाने जा रहे हैं, वह दो कसौटियों पर खरा उतरने वाला अवश्य हो :
(क) वह हल दूसरा सर्वोत्तम विकल्प हो, तथा
(ख) उस हल में आदर्श हल की ओर विकसित होने की क्षमता।
उपर्युक्त विचारों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो मैं यह कहने का साहस कर सकता हूं कि मैंने जो हल सुझाया है वह उपर्युक्त दोनों शर्तों को पूरा करता है।
भाग II
क्या महाराष्ट्र समर्थ दृष्टि से सक्षम प्रांत बन सकेगा ?
सामर्थ्य की कसौटी
- महाराष्ट्र प्रांत के निर्माण के विशिष्ट प्रश्न पर विचार करते समय इस बात की संतुष्टि कर लेना आवश्यक है कि यह प्रांत क्षमता की दृष्टि से समर्थ प्रांत होगा या नहीं। किसी भी प्रांत को सक्षम प्रांत घोषित करने से पहले उसे कुछ कसौटियों पर खरा उतरना पड़ता है। कसौटियां ये हैं : उसका एक निश्चित आकार हो, उसकी जनसंख्या एक निश्चित मात्रा से कम न हो तथा उसका राजस्व इनका समानुपाती हो। वह प्रांत न केवल आत्म - निर्भर होना चाहिए, आत्म - निर्भर तो कोई भी प्रांत अपने स्तर को घटाकर भी हो सकता है, अपितु उसका राजस्व भी पर्याप्त मात्रा में होना चाहिए, ताकि वह कार्यक्षमता की दृष्टि से वांछनीय तथा सामाजिक कल्पना की दृष्टि आवश्यक न्यूनतम प्रशासनिक मानक बनाए रख सके।
क्या महाराष्ट्र समर्थ है ?
- क्या महाराष्ट्र प्रांत इन कसौटियों पर खरा उतरता है? भाषायी आधार पर बने महाराष्ट्र प्रांत के आकार और उसकी जनसंख्या से संबंधित आंकड़े अगले पृष्ठ पर दिए जा रहे हैं :