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महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत 125

महाराष्ट्र को दो उप - प्रांतों का संघ बनाया जाना चाहिए। इनमें से एक उप - प्रांत में बंबई प्रेसिडेंसी के मराठी - भाषी जिले सम्मिलित होंगे और दूसरे उप - प्रांतों के रूप में महाराष्ट्र को विभाजित करने का विचार मध्य भारत और बरार के मराठी - भाषा जिलों के प्रवक्ताओं के मस्तिष्क की उपज है। मुझे पूरा भरोसा है कि ऐसी इच्छा केवल उन कुछ उच्च जाति वाले राज - नेताओं की है, जो यह सोचते है कि एकीकृत महाराष्ट्र के बन जाने पर उनका राजनीतिक जीवन चौपट हो जाएगा। मध्य भारत और बरार की जनता इस विचाराधारा का समर्थन नहीं करती। मुझे इस मुद्दे को यहां उठाना नहीं चाहिए था, किन्तु मैंने ऐसा केवल इसलिए किया है, ताकि मैं जिसे बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्धांत मानता हूं, उसके प्रख्यापन करने का मुझे अवसर मिल सके। जब यह तय हो चुका है कि महाराष्ट्र जैसा भाषावार प्रांत बनाया जाए तो मेरा दृढ़ मत है कि ऐसी स्थिति में एक ही भाषा - भाषी और सभी सटे हुए भू - भागों को उस प्रांत में सम्मिलित किया ही जाना चाहिए। तब न तो चुनाव का प्रश्न उठाया जाना चाहिए और न ही आत्म - निर्णय का। पूरा प्रयत्न किया जाना चाहिए, ताकि बड़ी प्रांतीय इकाइयां बनें। यदि छोटी - छोटी प्रांतीय इकाइयां बनेंगी तो वे सामान्य दिनों में सदा के लिए भार बनी रहेंगी और आपातकाल में तो निश्चित रूप से कमजोरी का स्रोत होंगी। इस तरह की परिस्थिति से बचा जाना चाहिए। इसलिए मेरा आग्रह है कि महाराष्ट्र के सभी भागों को मिलाकर एक ही प्रांत बना दिया जाए।

भाग IV
महाराष्ट्र और बंबई नगर

बंबई के बारे में विवाद

  1. बंबई शहर को महाराष्ट्र में सम्मिलित किया जाए या नहीं, इस प्रश्न पर काफी विवाद है। बंबई के इंडियन मर्चेंट्स चैम्बर भवन में एक बैठक हुई, जिसमें साठ से अधिक लोगों ने भाग नहीं लिया। इसमें भाग लेने वालों में एक भारतीय ईसाई को छोड़कर शेष सभी केवल गुजराती - भाषी व्यापारी और उद्योगपति थे। यद्यपि यह बैठक छोटी और एक विशिष्ट वर्ग से ही संबंधित थी, किन्तु इसकी कार्यवाही को भारत के सभी समाचार - पत्रों में प्रथम पृष्ठ पर महत्वपूर्ण स्थान मिला। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया‘ तो इससे इतना अधिक प्रभावित हुआ कि उसने इस पर संपादकीय ही लिख मारा। इस संपादकीय में एक ओर जहां महाराष्ट्रवादियों के खिलाफ वक्ताओं ने जो विष उगला उसके बारे में केवल हल्क शब्दों में भर्त्सना की गई, किन्तु दूसरी ओर बंबई के भविष्य के बारे में इस बैठक में जो प्रस्ताव पारित हुआ, उसका समर्थन भी किया गया। इससे तो उस बात की सच्चाई फिर सामने आती है, जो आयरलैंड संबंधी विवाद के दौरान आयरलैंड के नेता रैडमंड को जवाब देते समय लॉर्ड बर्कन हैड ने कही थी कि कुछ