126 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
मामलों में अल्पमत ही बहुमत बन जाता है। विवाद से संबंधित पक्ष तथा विपक्ष में दी गई दलीलों को सम्मिलित नहीं करता तो मेरा यह ज्ञापन बुरी तरह से अधूरा ही रह जाता। इस ज्ञापन में इसके दो कारण हैं : एक तो यह कि वह बैठक अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई और दूसरा यह कि इस बैठक में पारित प्रस्ताव को विश्वविद्यालयों के लब्धप्रतिष्ठ प्रोफेसरों का समर्थन मिला।
बंबई के बारे में प्रस्ताव
- उस बैठक में निम्नलिखित प्रस्ताव पारित हुआ :
(क) भाषावार प्रांतों के निर्माण का प्रश्न स्थगित कर दिया जाए, या
(ख) यदि इसे स्थगित न किया जा सके तो फिर बंबई शहर को एक अलग प्रांत
बना दिया जाए।
एक तीसरा सुझाव यह भी था कि कोंकण को एक अलग प्रांत का दर्जा दिया
जाए और बंबई उसकी राजधानी बने। इस प्रस्ताव के समर्थक न के बराबर
थे। इसलिए इस पर यहां विचार करना निरर्थक होगा।
बंबई के बारे में जो भी निर्णय किया जाए वह अभी किए जाए
- इस प्रस्ताव के उस अंश पर मेरी कोई आपत्ति नहीं है, जिसमें यह कहा गया है कि भाषावार प्रांतों के पुनर्गठन का काम स्थगित कर दिया जाए, बशर्ते कि इस मुख्य प्रश्न का हल ढूंढ लिया जाए कि बंबई को महाराष्ट्र में सम्मिलित करना है या नहीं। यदि इस समस्या का समाधान हो जाता है तो फिर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस समझौते को कार्यरूप में परिणत करने में पांच वर्ष लगेंगे या दस वर्ष। किन्तु यह प्रस्ताव तो सरासर पलायनवादी सिद्ध होता है। इससे मसला हल नहीं होगा। यह तो विवाद को केवल टाल देने की बात कहता है। मेरा तो मत है कि इस मुख्य समस्या का समाधान अविलंब किया जाए।
बंबई को महाराष्ट्र से अलग रखने का आधार
- बंबई को महाराष्ट्र से अलग रखने के पक्ष में इन तर्कों पर बल दिया जा रहा
है :
(क) बंबई कभी महाराष्ट्र का अंग नहीं रहा। ख्1,
(ख) बंबई कभी मराठा साम्राज्य का अंग नहीं रहा। ख्2,
1 प्रो. घीवला - फ्री प्रेस जरनल, 6 सितम्बर, 1948 और प्रो. मोरेस - फ्री प्रेस जरनल, 18 सितम्बर, 1948 2 वही