3. महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत - Page 145

128 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

बिंदु संख्या (1) और (2)

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  1. इन दोनों बिंदुओं पर इतिहास और भूगोल, दोनों के परिप्रेक्ष्य में विचार किया जा सकता है। फिर भी मेरा दृढ़ निश्चय है कि इस मुद्दे का हल इतिहास की सहायता से नहीं निकाला जा सकता। पहली बात तो यह विचारणीय है कि निष्कर्ष निकालने हेतु आवश्यक आधार सामग्री का संग्रह करने के लिए हम कितना पीछे जाएं। निःसंदेह, अति पुरातन इतिहास तो इस मामले में हमारी मदद करने से रहा। हां, वर्तमान काल के भूत से हमें इस बारे में अवश्य सहायता मिल सकती है। किन्तु इस मुद्दे को प्रभावित करने वाला जो निष्कर्ष इस कालखंड के भरोसे निकाला जाएगा, उस पर भी लोग प्रश्न चिन्ह लगा सकते हैं। इतिहास सम्मत काल खंडों में जन - समुदायों के बीच जो संपर्क ज्ञात हैं, वे सब विजेताओं और विजितों के बीच के हैं। भारत और यूरोप, दोनों पर यह बात लागू होती है। किन्तु इस प्रकार के संपर्कों के जो परिणाम निकले हैं, ये यूरोप और भारत में अलग - अलग प्रकार के रहे हैं। यूरोप में तो इस प्रकार के संपर्कों से परस्पर मेल न खाने वाले सामाजिक तत्वों के बीच समीकरण पैदा हुआ है। बार - बार के अंतर्वर्गीय विवाहों से मूल कुलों का उच्छेदन हो गया। एक भाषा विशेष ने, चाहे वह अत्यंत उपयोगी भाषा रही हो, चाहे सर्वाधिक बोली - समझी जाने वाली भाषा, उसने दूसरी भाषा को हटाकर उसकी जगह ले लेनी चाही। अगर एक ही देश में अनेक सभयताएं हैं और उनमें से कोई सभ्यता अन्यों से श्रेष्ठ है, तो उसने उन सबों को हटा कर स्वतः ही उनका स्थान ले लिया। समीकरण की यह सहज प्रवृत्ति, जो यूरोप में दिखाई देती है, इतनी अधिक सबल है कि इसे प्रभावहीन करने के लिए कदम उठाने होंगे। भारत में कौन - सी प्रवृत्ति काम कर रही है? निश्चय ही यह ऐसे समीकरण के खिलाफ है। मुसलमानों ने हिन्दुओं पर विजय पाई। किन्तु मुसलमान मुसलमान ही रहे और हिन्दू हिन्दू ही। मराठों ने गुजरातियों को जीता और कुछ वर्षों तक उन पर राज भी किया। किन्तु गुजरातियों पर इसका क्या प्रभाव पड़ा? कुछ भी नहीं। गुजराती गुजराती ही रहे और मराठे मराठे ही। चालुक्यों ने मराठों को जीता और इसी तरह शिलहरों ने भी उन पर विजय पाई। किन्तु इन सभी के बीच समीकरण नहीं हो पाया। सभी वही बने रहे, जो वे पहले थे। जब स्थिति ऐसी रही है तो फिर भारत का इतिहास इस मामले में निर्णय तक पहुंचने में कैसे मदद कर सकता है? आंतरिक उथल - पुथल एवं बाह्य आक्रमणों का इतिहास कभी किसी दुःस्वप्र या गुजरी घटना से अधिक कुछ नहीं माना गया। यहां विजय अभियानों का कभी कोई अर्थ नहीं रहा और न इनसे कुछ भी सिद्ध हो सका।
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  1. आइए, अब भूगोल का मुंह जोहें और उसका फैसला सुनें। भूगोल का साक्ष्य इतिहास के साक्ष्य से कहीं बेहतर लगता है। इसके लिए हमें बंबई की भौगोलिक अवस्थिति पर महाराष्ट्र प्रांत की अवस्थिति के प्रसंग में विचार करना पड़ेगा। महाराष्ट्र