3. महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत - Page 147

130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

जान पड़ते हैं। फिर भी प्रो. वकील ने अपनी मान्यता के पक्ष में जो कारण गिनाए हैं, उन्हें यदि कोई पढ़े तो उसे साफ पता चल जाएगा कि उनका यह निष्कर्ष यदि दिवा - स्वप्र नहीं तो कम से कम कल्पना की उड़ान तो अवश्य ही है। पर चलो, एक बार यह मान भी लें कि प्रो. वकील ने जो आंकड़े दिए है। वे सही हैं तो फिर इनका करें क्या? क्या इन्हें लेकर चाटें? इनसे क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है? क्या इन्हें जान लेने मात्र से महाराष्ट्र का बंबई पर दावा समाप्त मान लिया जाए? जब से अंग्रेजों ने भारत की सत्ता संभाली है, भारत एक देश रहा है और प्रत्येक व्यक्ति को एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की स्वतंत्रता रही है। यदि भारत के कोने - कोने से आकार लोगों को बंबई में बसने दिया गया तो इसका दुष्परिणाम महाराष्ट्रवासी क्यों भुगतें? इसमें उनकी गलती क्या है? इसलिए जनसंख्या की वर्तमान स्थिति को महाराष्ट्र में बंबई को न मिलने देने का आधार नहीं बनाया जा सकता। बिंदु संख्या (4)

क्या गुजराती भाई बंबई के मूलवासी हैं?

  1. इस प्रश्न की सभी वारीकियों पर हमें विचार कर लेना चाहिए। क्या गुजराती भाई बंबई के मूल निवासी हैं? यदि वे मूल निवासी नहीं हैं तो फिर वे बंबई में कैसे आए? उनकी संपत्ति का स्रोत क्या है? कोई गुजराती इस बात का दावा नहीं करेगा कि गुजराती लोग बंबई के मूल निवासी हैं। यदि वे यहां के मूल निवासी नहीं हैं तो फिर बंबई में आए कैसे? ठीक पुर्तगालियों, फ्रांसिसीयों, डचों और अंग्रेजों की तरह ही साहस दिखाते और जोखिम उठाते हुए उन्होंने रास्ता तय किया और वे यहां घुस आए। वे हर प्रकार का खतरा उठाने को तैयार थे। इतिहास इन प्रश्नों के जो उत्तर देता है, वे पूरी तरह स्पष्ट हैं। गुजराती भाई स्वेच्छा से बंबई नहीं आए थे। उन्हें तो ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसर आढ़तिया बनाकर यहां लाए थे। वे यहां लाए गए, क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसरों ने अपनी पहली फैक्टरी सूरत में लगाई थी और अपना व्यापार चलाने के लिए उन्हें आढ़तियों के रूप में सूरतिया बनियों का अच्छा अनुभव हो गया था। तो गुजरातियों के बंबई - प्रवेश की कहानी की यहां से शुरूआत हुई। दूसरी बात ध्यान देने की यह है कि गुजराती लोग अन्य व्यापारियों के साथ खुली और समान स्तर की प्रतियोगिता के आधार पर व्यापार करने के लिए बंबई नहीं आए थे। वे तो केवल उन सौभाग्यशाली व्यक्तियों के रूप में यहां आए थे, जिन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से व्यापार करने के लिए कुछ विशेषाधिकार मिले हुए थे। उन्हें बंबई लाने के प्रस्ताव पर पहली बार सन् 1671 में सूबेदार (गवर्नर) अंगियर ने विचार किया था। यह तथ्य ‘गजेटियर आफ बोंबे टाउन एंड आईलैंड‘, खंड 1 में इस तरह वर्णित है : *

बंबई के लाभ के लिए एक और योजना, जिसमें गवर्नर अंगियर ने खुद रुचि दिखाई

है, यह है कि सूरत के बनियों को लाकर बंबई में बसाया जाए। लगता है कि महाजनों

* बोंबे गजेटियर, खंड 1 पृष्ठ 46 - 47