महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत 133
ज. यदि युद्ध छिड़ जाए या कोई अन्य प्रकार की विपत्ति आ जाए जिससे उसको
नुकसान पहुंचने की संभावना हो तो ऐसी स्थिति में वह अपने गोदाम, संपत्ति
और परिवार ..... किले में सुरक्षित रख सकेगा।
झ. उसे या उसके परिवार के किसी सदस्य को किले में या गवर्नर या डिप्टी गवर्नर
के आवास में आने - जाने की छूट होगी, उनका नागरिक तौर - तरीकों से स्वागत -
सत्कार किया जाएगा, उनकी हैसियत के अनुसार उन्हें बैठने दिया जाएगा, उन्हें
बिना किसी प्रकार की बाधा पहुंचाए मन - मर्जी के अनुसार बग्घियों, घोड़ों या
पालकियों और छतरियों का उपयोग करने दिया जाएगा, उनके नौकर - चाकर
और रक्षक तलवार या कटारें धारण कर सकेंगे, उनके साथ गाली - गलौज नहीं
की जाएगी, न मारा - पीटा जाएगा और जब तक कोई अपराध न करें, उन्हें जेल
नहीं भेजा जा सकेगा। यदि उनके बाल - बच्चे या दोस्त किसी दूसरे पत्तन से
आएं तो उनके साथ भद्रता और आदरपूर्ण व्यवहार किया जाएगा।
´. उसे और उसके कानूनी प्रतिनिधि को नारियल, सुपारी, पान और अन्य कोई
भी वस्तु खरीदने और बेचने की छूट होगी।
- नीमा पारेख की याचिका को किस तरह निपटाया गया, इसे जानने के लिए बंबई के डिप्टी गवर्नर के दिनांक 3 अप्रेल, 1677 के उत्तर को देखा जा सकता है, जिसकी पंक्तियां इस तरह थीं :
‘‘आदेशनुसार हमने सीमा पारेख बनिए की याचिका में उल्लिखित मांगों पर विचार किया। यदि हम उन्हें ठीक से समझ पाए हैं तो हमें उन छूटों में किसी प्रकार के पूर्वाग्रह की आशंका नजर नहीं आती। इन छूटों का उपभोग तो छोटे से छोटा व्यक्ति भी कर रहा है।
‘‘पहली मांग को मानना सरल है, क्योंकि कंपनी के पास काफी जमीन खाली पड़ी है। जो बनिए या अन्य लोग यहां बसने को आते हैं, हम उन्हें रोज ही खाली जमीन देते रहते हैं। जहां तक दूसरी मांग का संबंध है, प्रत्येक व्यक्ति को उसके धार्मिक कृत्यों को पूरा करने की छूट मिली हुई है। उन्हें शादी - विवाह की रस्में मनाने और भोज देने की अनुमति है ही। बनिए तो मृतकों के शवों को जलाते ही हैं, उनमें किसी प्रकार की बाधा नहीं आने दी जाती। हमने बनियों के घरों के पास किसी को न तो जीव - हत्या की अनुमति दी हुई है और न ही कोई व्यक्ति किसी के घर या परिसर में बिना उसके मालिक की इजाजत के घुस ही सकता है, लोगों को उनकी इच्छा के विपरीत ईसाई बनाने के लिए बाध्य करने का तो कोई सवाल ही नहीं है, क्योंकि सारी दुनिया इसके औचित्य का प्रतिपादन करती है, न ही व्यक्ति को उसकी इच्छा के बिना कोई कार्य करने को बाध्य होना पड़ता है। कोई भी बनिया, ब्राह्मण, मूर या ऐसा कोई अन्य व्यक्ति निगरानी रखने और रखवाली करने का काम करने को बाध्य नहीं है। .... इसलिए नीमा की इस मांग को माना जा सकता है।
‘‘चौथे अनुच्छेद वाली मांग वस्तुतः एक विशेषाधिकार है किन्तु वह किसी हिन्दू, ईसाई