134 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
या किसी अन्य व्यक्ति को पहले से ही मिले अधिकार से अधिक की अपेक्षा नहीं करती। इसे कानून और न्याय के हाथों से छूट मांगना भी नहीं कहा जा सकता। इसमें तो बस इतनी भर मांग की गई है कि जो न्याय मिले, वह आदरपूर्वक मिलना चाहिए। इसके बारे में उसके मन में किसी प्रकार का संदेह नहीं रहना चाहिए। जहां तक उनके परस्पर मतभेदों को सुलझाने की बात है, महामना ने उनको ऐसा कर सकने का अधकिर पहले से ही दे रखा है।’’
‘‘जहां तक पांचवीं मांग का सवाल है, प्रति टन एक रुपए का लंगर - शुल्क अब पूरी तरह उठा लिया गया है। अब सौ टन के लिए एक रुपए का नाममात्र का शुल्क लिया जाता है, जो इतना महत्वहीन है कि हम इसके लिए अड़े रहें - यह आवश्यक नहीं है। यदि वह हठ करता है तो इसका असर तो पड़ेगा ही। पर यह मामला इतना तुच्छ है और इसका संबंध केवल उसके जलयानों तक ही सीमित है, इसलिए इसे भी आसानी से माना जा सकता है।’’
‘‘यदि हम ठीक से समझ पाए हैं तो छठी सुविधा तो अन्य सभी लोगों को उपलब्ध है, उससे अधिक कुछ नहीं है। .........यदि वह चाहता है कि जो सामान वह बेच नहीं पाए, उसका लदान करते समय या उसे उतारते समय उसके लिए उसे कस्टम न चुकाना पड़े तो ऐसा करने से कंपनी को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा, क्योंकि उन्होंने दो वर्षों के लिए कस्टम ड्यूटी से होने वाली आय का हिसाब किताब बना लिया है। हमारा विश्वास है कि उसके यहां बस जाने से होने वाला लाभ भी उस समय तक नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएगा, जब तक कि कस्टम फिर से कंपनी के हाथों में ना आ जाए।’’
‘‘सातवीं मांग के बारे में यह कहा जा सकता है कि हमने कानून बना ही रखा है कि अगर कोई व्यक्ति एकाधिक लोगों का ऋणी हो तो जिस भी ऋणदाता के पक्ष में न्यायालय पहले फैसला सुनाएगा, उसी को पहले पूरे ऋण का भुगतान होगा। ऐसी स्थिति में न तो किसी व्यक्ति को यह मानना चाहिए कि उसके साथ अन्याय हुआ है और न ही कोई ऋणदाता एक बार भुगतान हो जाने के संबध में दावा करेगा, क्योंकि जब फैसला सुनाया जा चुका है, तब यह माना जाएगा कि कानूनी तौर से पूरा भुगतान किया जा चुका है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति दो व्यक्तियों का ऋणी हो और पहला व्यक्ति उसके खिलाफ मुकदमा दायर करता है और उसके बाद दूसरा व्यक्ति भी उसके खिलाफ मुकदमा दायर करता है, तब ऐसी स्थिति में किस कानून के अंतर्गत कर्जदार की संपत्ति को दूसरे ऋणदाता को दे सकते हैं। इसलिए उसे आश्वस्त किया जा सकता है कि हमारे कानून के अनुसार तेजी से उसके साथ न्याय किया जाएगा और यदि कर्जदार समर्थ है तो उसे पूरे ऋण का भुगतान करने को बाध्य किया जा सकता है और यदि वह पूरे ऋण का भुगतान न करेगा तो बकाया ऋण के एवज में उसे हवालात में रखा जा सकता है, जब तक कि महामना उसे छोड़ने की इजाजत न दें। ऐसी स्थिति आने पर हम यह मानते हैं कि उसे इससे संतोष हो जाएगा।’’
‘‘जहां तक आठवीं मांग का संबंध है, लड़ाई छिड़ जाने की स्थिति में धनी व्यक्ति को किले में जाने और अपनी संपत्ति व महत्व की चीजों को सुरक्षित रखने के लिए स्वतंत्रता