महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत 137
लगाए तब भी क्या बंबई पर उनके दावे को जमीन गिरवी रखने वाले की तुलना में स्वीकार किया जा सकता है?
बंबई को महाराष्ट्र में मिलाया जाना चाहिए या नहीं - इस समस्या को हल करते समय मेरी समझ में बंबई में किसने व्यापार और उद्योग स्थापित किए, यह प्रश्न उठाना बेमानी होगा। व्यापार और उद्योग पर एकाधिकार के सवाल पर आधारित यह तर्क वास्तव में एक राजनीतिक दलील भर है। इसका मतलब तो यह हुआ कि मालिकों को मजदूरों पर हुकूमत करने का हक है, न कि मजदूरों को मालिकों पर। जो लोग इस तरह की दलील देते हैं, वे शायद यह नहीं जानते कि वे किसकी मुखालफत कर रहे हैं। क्या वे इस दलील को केवल बंबई तक ही सीमित रखना चाहते हैं या यह भी चाहते हैं कि उनका यही तर्क और जगह भी लागू हो?
ऐसा कोई कारण दिखाई नहीं देता, जिसकी वजह से यह कहा जा सके कि इस तर्क को अन्यत्र सार्वभौमिक तर्क के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। जिस तरह बंबई शहर का समाज मालिकों और मजदूरों के रूप में या पूंजीपतियों और वेतनभोगियों के रूप में बंटा हुआ है, वहीं स्थिति गुजरात में या कहें भारत के सभी प्रांतों में पाई जाती है। यदि बंबई के मालिकों और पूंजीपतियों को केवल इस तर्क पर संरक्षण मिलता है कि महाराष्ट्रवासी तो मजदूर वर्ग में आते हैं इसलिए बंबई को महाराष्ट्र में न मिलने दिया जाए, तो फिर ये तर्कदाता गुजरात के मजदूर वर्ग से गुजरात के ही पूंजीतियों को बचाने के लिए कौन - सा रास्ता सुझाएंगे। वकील और दांतवाला जैसे गुजराती प्रोफेसर लोग बंबई के गुजराती पूंजीपतियों के समर्थन से सिर खुजला - खुजलाकर जो दलीलें खोज रहे हैं, क्या उन्होंने कभी यह सोचने का भी कष्ट किया है कि गुजरात में ही वहां के मेहनतकश वर्ग से गुजराती पूंजीपतियों को किन तौर - तरीकों से बचाया जाए? क्या वे यह सुझाव देना चाहेंगे कि वयस्क मताधिकार की पद्धति को समाप्त कर दिया जाए? यदि वे मुख्यतः बंबई के ही गुजराती पूंजीपतियों को बचाना न चाह कर सामान्यतः सभी पूंजीपतियों को बचाना ही चाहते हैं, तब तो केवल यही एक रास्ता है।
हां, एक तर्क ऐसा है, जिस पर ये प्रोफेसर लोग जोर दे सकते हैं। वह यह है कि जब बंबई महाराष्ट्र में सम्मिलित हो जाए तो बहुसंख्यक महाराष्ट्रवासी बंबई के इन गुजराती पूंजीपतियों से भेदभाव बरतेंगे। इस प्रकार के तर्क के पीछे छिपी हुई भावना को समझा जा सकता है। किन्तु इस तर्क को आगे करने वालों को दो बातें याद रखनी चाहिएं :
(क) महाराष्ट्र ही केवल ऐसा स्थान नहीं है, जहां इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न हो सकती
है। ऐसी स्थिति तो कहीं भी उठ - खड़ी हो सकती है। मैं बिहार का उद्धरण देना
चाहता हूं। बिहार में कोयला पाया जाता है। कोयला मिलने वाली जमीनें बिहार
की हैं। किन्तु कोयले की खानों के मालिक गुजराती, काठियावाड़ी और यूरोपवासी
हैं। क्या इस बात की संभावना नजर नहीं आती कि बिहारवासी इन गुजराती और
कठियावाड़ी कोयला मालिकों से भी भेदभाव बरतेंगे? क्या कोयला पाए जाने वाले