3. महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत - Page 155

138 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

इन इलाकों को बिहार प्रांत से अलग करके कठियावाड़ी और गुजराती कोयला

मालिकों के हित में इनका एक अलग प्रांत बनाया जा सकता है?

(ख) भारत का संविधान बनाते समय इस संभावना को ध्यान में रखा गया है कि

कहीं भी अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभाव पनप सकता है और इसलिए उसमें

ऐसा न होने देने के लिए पर्याप्त प्रावधान किया गया है। मूल अधिकार दिए

गए हैं, भेदभाव मिटाने के और क्षतिपूर्ति के प्रावधान हैं। इसके अतिरिक्त उच्च

न्यायालय तो हैं ही। जिनमें ये अधिकार अंतर्निहित हैं कि यदि किसी नागरिक

को कोई व्यक्ति या सरकार किसी प्रकार की हानि पहुंचाए, उसके प्रति अन्याय

करे या उसे परेशान करे तो उनके खिलाफ याचिका दर्ज कराने पर उन्हें ऐसा

करने से रोका या दंडित किया जा सकता है। भेदभाव की आशंका के खिलाफ

बंबई के व्यापारी और उद्योगपति और क्या बचाव के साधन पाना चाहते हैं? बिंदु संख्या (7)

बंबई की अतिरिक्त आय पर महाराष्ट्र की दृष्टि

  1. महाराष्ट्रवासियों की दृष्टि बंबई की अतिरिक्त आय पर है - यह आरोप लगाने से पहले यह तो सिद्ध हो जाना चाहिए कि बंबई अतिरिक्त आय वाला शहर है। बेशी आमद की जो बात उठी है, वह वास्तव में लेखे - जोखे की गड़बड़ी का नतीजा है। लेखे - जोखे में गड़बड़ी तब मानी जाएगी जब (1) गवर्नर और उसके अमले, (2) मंत्रियों और उनके अमलों, (3) धारासभा, (4) न्यायपालिका, (5) पुलिस, और (6) पुलिस कमिश्नरों और शिक्षा निदेशकों जैसे प्रांतीय अमलों पर होने वाले सभी प्रकार के खर्चों को लेखांकन में सम्मिलित न किया जाए। यदि इन मदों पर होने वाले व्यय को भी जोड़ा जाए तो मुझे नहीं लगता कि कराधान की वर्तमान दरों के आधार पर बंबई को अतिरिक्त आय वाला शहर करार दिया जा सकता है। इसे तर्काभास ही माना जाएगा कि बंबई के लिए इन मदों पर होने वाले खर्च को तो महाराष्ट्र के नाम चढ़ाया जाता है और बंबई को इनसे मुक्त रखते हुए यह घोषित किया जाता है और तर्क दिया जाता है कि बंबई की आय उस पर होने वाले व्यय से अधिक है।

  2. महाराष्ट्रीय बंबई को महाराष्ट्र में इसलिए मिलाना चाहते हैं, क्योंकि वे बंबई के अतिरिक्त राजस्व को अपने उपयोग में लाना चाहते हैं - यह कथन न केवल गलत है, वरन् महाराष्ट्रवासियों की नीयत पर भी शक पैदा करने वाला है। क्या वास्तव में उनकी नीयत

खराब है? इसका उत्तर मेरे पास नहीं है, किन्तु मैं इतना जरूर जानता हूं कि उनका समाज व्यवसायी मनोवृत्ति वाला नहीं है। कुछ अन्य समुदायों की तरह वे पैसे को दांत से नहीं पकड़ते। मैं उन लोगों में से एक हूं, जो यह मानते हैं कि यही सबसे बड़ा गुण भी है। उन्होंने रुपए - पैसे को कभी देवता की तरह नहीं पूजा। ऐसा करना उनकी संस्कृति