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महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत 139

का हिस्सा नहीं है। इसलिए तो उनके प्रांत में बाहर वाले समुदाय आते गए ओर वहां के व्यापार और उद्योग के मालिक बन बैठे। मैं यह बात साबित कर चुका हूं कि बंबई वास्तव में अतिरिक्त आय वाला शहर नहीं है और न ही उनकी दृष्टि इस अतिरिक्त आय पर गड़ी हुई है।

  1. किन्तु मान लो, महाराष्ट्रवासियों की नीयत यही है, तो भी इसमें दोष कहां है? बंबई की अतिरिक्त आय पर अन्य प्रांतों के लोगों की अपेक्षा उनका दावा अधिक कारगर है, क्योंकि वहां के व्यापार और उद्योगों की उन्नति के लिए मजदूरों की पूर्ति करने में उनका योगदान सर्वाधिक रहा है और भविष्य में भी रहेगा। कोई भी प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री इस बात को नकार नहीं सकता कि पूंजी लगाने वालों का उत्पादित संपत्ति पर जितना अधिकार होता है, उससे अधिक नहीं तो कम से कम बराबर का अधिकार तो मजदूर वर्ग का भी होता ही है।

  2. दूसरी बात यह है कि बंबई की अतिरिक्त आय का उपभोग केवल महाराष्ट्रवासी ही नहीं करते, पूरा भारत करता है। आयकर, अधिकर आदि के रूप में बंबई से जो आमदनी केंद्र सरकार को होती है, वह सब केंद्र सरकार द्वारा अखिल भारतीय कार्यों के लिए खर्च की जाती है। और इस तरह अन्य सभी प्रांत उससे लाभ उठाते हैं। यदि बंबई की अतिरिक्त आय को संयुक्त प्रांत वाले, बिहार वाले, असम वाले, उड़ीसा वाले, पश्चिम बंगाल वाले, पूर्वी पंजाब वाले और मद्रास वाले हजम कर जाते हैं तो प्रो. वकील के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। बस उन्हें आपत्ति है तो केवल इस बात से कि उसका कुछ हिस्सा महाराष्ट्रवासियों को क्यो मिलें। तब वे शोर मचाने लगते हैं। इसे तर्कपूर्ण नहीं माना जा सकता। इससे तो केवल उनकी महाराष्ट्रवासियों के प्रति घृणा ही झलकती है।

  3. मान लो, बंबई का एक अलग प्रांत बन जाता हैं तब भी मेरी समझ में यह बात नहीं आती कि प्रो. वकील बंबई की अतिरिक्त आय में महाराष्ट्र की हिस्सेदारी को कैसे रोक पाएंगे। यदि बंबई से आयकर, अधिकर आदि के रूप में आमदनी होगी और ऐसी स्थिति में प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से बंबई से प्राप्त राजस्व का कुछ हिस्सा महाराष्ट्र को अवश्य मिलेगा। मैं ऊपर बता ही चुका हूं कि प्रो. वकील के तर्क में सार कम है, दुर्भावना या ईष्याभाव अधिक। बिंदु संख्या (8) और (9)

बंबई को महाराष्ट्र में सम्मिलित करने के प्रस्ताव के

विपक्ष में दी जाने वाली आम दलीलें

  1. अब मैं उन दलीलों का विवेचन करूंगा, जिन पर प्रो. दांतवाला और प्रो. घीवाला जोर देते रहे हैं। उनके तर्क - वितर्क तो भाषावार प्रांतों के निर्माण के सिद्धांत के मूल पर ही कुठाराघात करने वाले हैं। इसी वजह से मुझे इस ज्ञापन के भाग 1 में ही उन पर