140 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
विचार करना चाहिए था। पर चूंकि उनके तर्कों का लक्ष्य बंबई को महाराष्ट्र में सम्मिलित न करने देना है इसलिए मैंने भी यह उचित समझा कि ज्ञापन के इसी भाग में उन पर विचार किया जाए।
दोनों प्रो. के तर्कों का सार यह है कि भाषावार प्रांतों का गठन ठीक नहीं है। भाषावार प्रांतों के गठन के खिलाफ यह जो आवाज उठी है, उसे उठाने में बहुत देर कर दी गई। दोनों प्रोफेसर कब से इसके खिलाफ हैं, यह पता नहीं चल पाया है। क्या वे भाषा के आधार पर गुजरात के पुनर्गठन के भी विरुद्ध हैं - इसे जो उन्होंने स्पष्ट नहीं किया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि भाषावार प्रांतों के गठन के सिद्धांत को तो वे मान्यता देते हैं, किन्तु जब उन्होंने देखा कि इसे मान लेने पर बंबई से हाथ धोना पड़ सकता है, क्योंकि इस सिद्धांत के आधार पर ही तो बंबई महाराष्ट्र में लिया जाएगा, तो अचानक वे बौखला उठे और इसका विरोध करने लगे। शायद यह एक ऐसा मामला है, जिसमें कोई व्यक्ति अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने तर्कों को उपयुक्त न पाकर किसी ऐसे तर्क का सहारा लेने के बाध्य हो जाता है, जो उसी बात को अधिक सही तौर पर प्रमाणित कर देता है, जिसे वह छोड़ना चाहता था। फिर भी, मैं यहां उनके तर्क के सार का परीक्षण करने को तैयार हूं।
प्रो. दांतवाला ने भाषावार प्रांतों के निर्माण के खिलाफ अपने मत की पुष्टि के लिए लार्ड एक्टन का सहारा लेते हुए उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द हिस्ट्री आफ फ्रीडम एंड अदर ऐसेज‘ में संकलित ‘ऐसेज आन नेशनेलिटी‘ से निम्नलिखत उद्धरण दिया है :
‘‘जिस तरह समाज लोगों से मिलकर बनता है, उसी तरह सभ्य जीवन की यह आवश्यक शर्त है कि एक राज्य में विभिन्न राष्ट्र मिलकर एक हो जाएं।‘‘
- खेद है कि उपर्युक्त उद्धरण लार्ड एक्टन की छवि को पूरी तरह गलत ढंग से प्रस्तुत करता है। इस उद्धरण में एक पूरे अनुच्छेद की कुछ आरंभिक पंक्तियां ही दी गई हैं। पूरा अनुच्छेद यह है :
‘‘जिस तरह समाज लोगों से मिलकर बनता है, उसी तरह सभ्य जीवन की यह एक आवश्यक शर्त है कि एक राज्य में विभिन्न राज्य मिलकर एक हो जाएं। हीन प्रजातियां राजनीतिक संघ के रूप में बौद्धिक स्तर पर श्रेष्ठ प्रजातियों के साथ रहते हुए अपना विकास करती हैं। लुप्त होते और क्षीण होते राष्ट्रों में नवीन और जीवंत राष्ट्रों का स्पर्श पाकर नए जीवन का संचार होने लगता हैं। जिन राष्ट्रों में या तो निरंकुशता के मर्यादाहीन प्रभाव के कारण या लोकतंत्र के विघटनकारी तत्वों के कारण संगठन शक्ति और शासन की क्षमता लुप्त हो जाती है, जब वे किसी सबल और विकृत प्रजाति के अनुशासन के तले आ जाते हैं, तो उनमें वे शक्तियां पुनः जाग उठती हैं। केवल एक शासन के अधीन रहकर ही यह उर्वरक और संजीवनी प्रक्रिया फलित होती है। राज्य के कडा़ह में ही पककर यह अवलेह तैयार होता है, जिसका सेवन कर कोई राष्ट्र शक्तिशाली और ज्ञानवान हो जाता है और तब वह उन्हें मानवता के किसी अन्य अंश में संचारित कर सकता है।‘‘