3. महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत - Page 158

महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत 141

  1. यह समझ पाना मुश्किल है कि प्रो. दांतवाला ने उस अनुच्छेद के शेष अंश को उद्धत क्यों नहीं किया। मैं यह नहीं मानता कि सत्य को छिपाने और झूठ की फसल उगाने के लिए ऐसा कदम जानबूझ कर उठाया गया हैं तथ्य तो यह है कि इस आंशिक उद्धरण से लार्ड एक्टन का कथन सही रूप में प्रस्तुत नहीं हो सकता है। मैं यह समझने में अक्षम हूं कि प्रो. दांतवाला ने इसे उद्धत क्यों किया? बिल्कुल साफ बात है कि यदि हीन प्रजातियों को श्रेष्ठ प्रजातियों के साथ मिला दिया जाए, तो हीन प्रजातियों में परिष्कार हो सकता है। किन्तु प्रश्न तो यह है कि किसे हीन माना जाए और किस श्रेष्ठ। क्या गुजराती महाराष्ट्रवासियों से हीन हैं? या महाराष्ट्रवासी गुजरातियों से हीन हैं? दूसरी बात यह है कि गुजरातियों और महाराष्ट्रवासियों के बीच संसर्ग की वह कड़ी कौन सी है, जो दोनों का एकाकार कर सके? प्रो. दांतवाला ने शायद इस प्रश्न पर विचार नहीं किया है। उन्होंने तो लार्ड एक्टन के निबंध में एक - दो वाक्य देखे और बस झपट पड़े उस अंश पर। हो सकता है, इसका कारण यह रहा हो कि उनके तर्क की पुष्टि के लिए और कोई सामग्री उपलब्ध थी ही नहीं। बात तो बस इतनी भर है कि इस अनुच्छेद में ऐसी कोई बात नहीं कही गई है, जो भाषावार प्रांतों के गठन के सिद्धांत से मेल खाती हो।

  2. प्रो. दांतवाला की दलीलों के बारे में बस इतना कहना पर्याप्त होगा। अब मैं प्रो. घीवाला द्वारा प्रतिपादित विचारों का परीक्षण करूंगा। प्रो. घीवाला ने भी अपने अभिमत की पुष्टि के लिए लार्ड एक्टन के कथन का सहारा लिया है। उन्होंने भी उपर्युक्त लेख का ही उद्धरण दिया है। उद्धरण वाला अनुच्छेद इस प्रकार है :

‘‘राष्ट्रीयता के अधिकारों का सबसे बड़ा शत्रु राष्ट्रीयता का आधुनिक सिद्धांत ही है। सैद्धांतिक स्तर पर राज्य और राष्ट्र, दोनों को समानुरूपी मान लेने के व्यावहारिक स्तर पर उस राज्य की सीमाओं में पाई जाने वाली अन्य सभी राष्ट्रिकताओं के स्तर को अधीनस्थ स्तर पा ला दिया जाता है। यह सिद्धांत अन्य राष्ट्रियकताओं को शासक राष्ट्र, जो स्वयं राज्य बन जाता है, की बराबरी का दर्जा नहीं देता, क्योंकि बराबरी का दर्जा देने पर तो वह राज्य फिर एक राष्ट्र नहीं रह पाएगा और तब एक राज्य एक राष्ट्र के सिद्धांत में विराधाभास नजर आने लगेगा। इसलिए उस प्रभुत्व - संपन्न निकाय में, जिसमें समुदाय के सभी अधिकारों पर दावा बना रहता है, मानवता और सभ्यता की मात्रा के अनुसार हीन प्रजातियों को या तो निर्मूल कर दिया जाता है या उन्हें गुलाम बना दिया जाता है या बहिष्कृत कर दिया जाता है या फिर पराधीनता के स्तर पर ले आया जाता है।‘‘

  1. मेरे लिए यह समझना मुश्किल है कि विद्वान प्रोफेसर ने अपने विचारों की पुष्टि के लिए लार्ड एक्टन के नाम को क्यों घसीटा है। उपर्युक्त अनुच्छेद तो उनकी मान्यता की तनिक भी पुष्टि करता नहीं लगता। हो सकता है कि एक बात उनके मन में घर कर गई हो। उन्होंने सोचा होगा कि यदि बंबई महाराष्ट्र में सम्मिलित हो गया, तो उस प्रांत में दो राष्ट्रिकताएं हो जाएंगी - एक मराठी - भाषियों की और दूसरी गुजराती - भाषियों की। चूंकि मराठी - भाषी वर्ग शासक वर्ग होगा, इसलिए वह गुजराती - भाषी वर्ग को अध्