142 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
ानस्थ स्तर पर ले आएगा। केवल इसी बात को पुष्ट करने के लिए उन्होंने लार्ड एक्टन के उपर्युक्त कथन को उद्धत करना उचित समझा होगा। ऐसी संभावना के लिए पूरी गुंजाइश है। उन्होंने समस्या को जिस रूप में प्रस्तुत किया है, उसके बारे में मेरी आपत्ति नहीं है। किन्तु उन्होंने जो निष्कर्ष निकाले हैं, उनके बारे में मैं घोर आपत्ति प्रकट करता हूं।
पहली बात तो यह है कि भारत जैसे देश में जहां समाज पूरी तरह से संप्रदायों में बंटा हुआ है, चाहे जिस तरह से उसे प्रशासनिक क्षेत्रों में बांटा जाए, हर क्षेत्र में हमेशा कोई न कोई समुदाय विशेष अपनी जनसंख्या के बल पर प्रभावशाली रहेगा ही रहेगा। चूंकि वह प्रभावशाली समुदाय होगा, इसलिए उस क्षेत्र को जो भी राजनीतिक शक्ति मिलेगी, वह सब उसी समुदाय में निहित होगी। यदि बंबई सहित एकीकृत महाराष्ट्र प्रांत में मराठी - भाषी समुदाय गुजराती - भाषी लोगों की तुलना में प्रभावशाली हो जाता है तो क्या ऐसी संभावना को केवल महाराष्ट्र तक ही सीमित किया जा सकता है? क्या ऐसी परिघटना मराठी - भाषी लोगों के बीच संभव नहीं है? गुजरात प्रांत के पुनर्गठन के बाद क्या यही बात गुजरात पर लागू नहीं होगी? मराठी - भाषी लोग भी मराठों और गैर - मराठी के रूप में पूरी तरह विभक्त है। चूंकि मराठा वर्ग प्रभावशाली है, इसलिए मुझे पूरा विश्वास है कि वह वर्ग गुजराती - भाषियों और गैर - मराठा, दोनों को ही अधीनस्थ श्रेणी पर ले आएगा। इसी तरह गुजरात के कुछ हिस्सों में अनाविल ब्राह्मण वर्ग प्रभावशाली है, तो कुछ अन्य क्षेत्रों में पाटीदार वर्ग। पूरी संभावना है कि अनाविल ब्राह्मण वर्ग और पाटीदार वर्ग, दोनों ही अन्य समुदायों को अपने - अपने क्षेत्रों में पछाड़ देंगे। इसलिए कहा जा सकता है कि यह समस्या केवल महाराष्ट्र की समस्या नहीं है, यह तो एक आम समस्या अर्थात् अखिल भारतीय समस्या है।
इस समस्या का समाधान क्या है? प्रो. घीवाला की मान्यता है कि यदि मिश्रित राज्य बना दिए जाएं तो समस्या हल हो सकती है। यह हल प्रो. घीवाला के मस्तिष्क की उपज नहीं है। उन्होंने इसे लार्ड एक्टन से ही ग्रहण किया है। मेरे मतानुसार निःसंदेह लार्ड एक्टन द्वारा सुझाया गया यह हल पूरी तरह गलत हैं। लार्ड एक्टन ने अपने मत की पुष्टि में आस्ट्रिया का उद्धरण दिया है। दुर्भाग्यवश आस्ट्रिया का जो हाल हुआ, उसे अपनी आंखों से देखने के पूर्व ही लार्ड एक्टन का निधन हो गया। आस्ट्रिया एक मिश्रित राज्य था। मिश्रित राज्य होने की वजह से लार्ड एक्टन के मतानुसार इसमें सभी राष्ट्रिकताएं सुरक्षित रहनी चाहिए थीं। पर सुरक्षित रहने के स्थान पर, उन सभी में फूट पड़ गई और परस्पर संघर्ष होने लगा। परिणाम जो हुआ, वह सबके सामने है। आस्ट्रिया खंड - खंड होकर बिखर गया। वास्तविक हल मिश्रित राज्य में निहित नहीं है। वह तो निहित है, निरपेक्ष राज्य में, जिसमें जनता के हाथ में सत्ता नहीं होती। जनता के नाम पर सत्ता का खेल चलता रहता है। क्या प्रो. घीवाला इस हल को अपनाने के लिए तैयार हैं? उनका क्या उत्तर होगा, इसे बताने की आवश्यकता नहीं है।