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महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत 143

  1. दूसरी बात यह है कि प्रो. घीवाला ने राष्ट्रिकता की परिभाषा को उलझा दिया है। एक ओर वे इस शब्द का प्रयोग सामाजिक अर्थ में करते हैं, दूसरी ओर उसी इसी को वे विधिक और राजनीतिक अर्थों में भी स्वीकार करते हैं। भाषावार प्रांतों के प्रसंग में भी लोग राष्ट्रिकता का नाम बार - बार दुहराते हैं। तब इस शब्द का प्रयोग केवल गैर - विधिक और गैर - राजनीतिक अर्थों में होता है। मेरी योजना में किसी पृ थक प्रांतीय राष्ट्रिकता के विकास के लिए गुंजाइश नहीं है। जब कभी अंकुरित होने के लक्षण नजर आएं, तो उसे नोच डालने में कोई दोष नहीं होगा। भाषावार प्रांतों की चर्चा करते समय सामान्यतः यह सुझाव दिया जाता है कि प्रांतों की भाषाओं को वहां की राजभाषाएं बनाया जाए। यदि यह प्रस्ताव मान भी लिया जाता है तो भी उन प्रांतों के साथ प्रभुत्व संपन्नता का वह विशेषण चस्पा नहीं किया जा सकता, जो स्वतंत्र राष्ट्रों के साथ जुड़ा होता है।

  2. वास्तव में, प्रो. घीवाला क्या चाहते हैं, इसे समझना मुश्किल है। मोटे तौर पर वे दो बातें चाहते हैं : एक - मिश्रित राज्य बनाए जाएं। दो - वे यह भी चाहते हैं कि प्रभावशाली वर्ग इस स्थिति में न पहुंच पाए कि वह अन्य छोटे - छोटे वर्गों को अधीनता की श्रेणी में ले आए। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में भाषावार प्रांतों का गठन किस प्रकार आड़े आ सकता है, इसे मैं नहीं समझ पाया हूं। क्योंकि भाषाओं के आधार पर प्रांतों का गठन हो जाने के बाद भी -

(क) सभी प्रांतों में विभिन्न समुदायों का घालमेल बना रहेगा। यही तो मिश्रित राज्य

होगा, जिसकी मांगें प्रो. घीवाला कर रहे हैं।

(ख) यदि प्रो. घीवाला की यह मंशा है कि एक निश्चित संकल्पना वाला मिश्रित

राज्य बने, जो छोटे - छोटे समुदायों या राष्ट्रिकताओं की रक्षा कर सके, तो ऐसी

संभावना भी है। ऐसा राज्य उन्हें निश्चय ही केंद्र स्तर पर मिलेगा।

मैं पहले ही कह चुका हूं कि मिश्रित राज्य न तो अच्छा राज्य होगा और न ही स्थायी राज्य। फिर भी, यदि प्रो. घीवाला को यह पसंद है तो वह किसी न किसी रूप में उनको मिल ही जाएगा, प्रांतों के स्तर पर भी और केंद्र के स्तर पर भी। प्रांतों में उसका स्वरूप विभिन्न समुदायों के रूप में होगा और केंद्र में विभिन्न प्रांतों के प्रतिनिधियों के रूप में।

  1. उनके दूसरे लक्ष्य के बारे में कहूं तो कह सकता हूं कि दूसरी सुरक्षा उपलब्ध होगी। पहली सुरक्षा इस तरह से कि उनकी योजना के अनुसार ही नागरिकों को वह मिश्रित राज्य के रूप में उपलब्ध होगी। दूसरी यह कि पूरे देश में समान नागरिकता लागू होगी। प्रांतीय नागरिकता का प्रावधान नहीं होगा। महाराष्ट्र में बसे गुजराती - भाषी को नागरिकता संबंधी वे सभी अधिकारी उपलब्ध होंगे, जो किसी मराठी - भाषी को महाराष्ट्र में उपलब्ध हैं।

इन तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में प्रो. घीवाला के भाषा पर आधारित प्रांतों के गठन पर क्या आपत्ति हो सकती है?

  1. प्रो. घीवाला ने दो अन्य सुझाव भी दिए हैं : (1) यदि प्रांतों का पुनर्गठन किया