144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
ही जाना है तो वह तार्किक आधार पर होना चाहिए न कि भाषायी आधार पर, और (2) राष्ट्रिकता को निजी वस्तु बनाया जाए।
भाषा के आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन की तुलना में आर्थिक आधार पर (तार्किक आधार कहने का अभिप्रायः यही है) प्रांतों के पुनर्गठन की बात करना ऊपरी तौर पर अधिक वैज्ञानिक लगता है। पर मेरे मतानुसार, भाषावार प्रांतों का पुनर्गठन अवैज्ञानिक माने जाने के बावजूद, भारत के आर्थिक संसाधनों के तार्किक उपयोग के मार्ग में कैसे बाधक होगा यह स्पष्ट नहीं किया गया है। प्रांतीय सीमाएं होती हैं। आर्थिक संसाधनों के समुचित उपयोग में ये सीमाएं आर्थिक स्तर पर बाधाएं नहीं डालतीं। यदि स्थिति यह होती कि भाषावार प्रांतों के निर्माण की योजना शरारत भरी अर्थात् हानिकारक है। किन्तु ऐसी स्थिति तो है नहीं, जब तक भाषावार प्रांतों को इस बात की इजाजत नहीं दी जाती कि वे उस प्रांत में पाए जाने वाले संसाधनों का किसी भी सक्षम और इच्छुक व्यक्ति, संस्था या निकाय द्वारा दोहन किए जाने पर रोक लगा सकें, तब तक तो भाषावार प्रांत वे सभी लाभ देते रहेंगे, जो कोई भी तार्किक दृष्टि से गठित प्रांत दे सकता है।
राष्ट्रिकता को निजी वस्तु बनाने और उसे धर्म के समान ही दर्जा देने के प्रस्ताव को अति आदर्शवादी किन्तु अव्यावहारिक मानते हुए रद्द कर दिया जाना चाहिए। इसे मान लेने पर अनेक प्रकार की प्रशासनिक कठिनाइयां या समस्याएं उभर आने का खतरा है ऐसा तभी संभव है, जब सारा संसार एक हो जाए और मानव मात्र उसके नागरिक बन जाएं (वसुधैव कुटुंबकम्) ऐसी स्थिति में राष्ट्रिकता स्वतः ही लुप्त हो जाएगी, क्योंकि जब उसकी उपयोगिता रहेगी ही नहीं।
अब तक मैंने केवल उन लोगों के अभिमतों पर ही विचार किया है, जो बंबई को महाराष्ट्र में मिलाने के पक्षपाती हैं। मैंने तो उन पर विचार केवल इसलिए किया है, ताकि मैं सामान्य जनता को उनक बहकावे में आकर गुमराह होने से बचा सकूं। ऐसा होने की पूरी संभावना दो कारणों से नजर आ रही थी। एक - जिन लोगों ने ये दलीलें दी हैं वे साधारण लोग नहीं है। विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हैं। दो - जब प्रोफेसर गाडगिल ने बंबई को महाराष्ट्र में सम्मिलित करने का प्रस्ताव रखा, इसके बाद ही ये प्रोफेसर लोग मुखर हुए। दुर्भाग्यवश, प्रोफेसर गाडगिल के विरोधियों के तर्कों को काटने के लिए अभी तक कोई व्यक्ति सामने नहीं आया। परिणामस्वरूप यह धारणा बनती जा रही थी कि प्रोफेसर गाडगिल के प्रतिद्धंद्धियों ने मैदान मार लिया है। इस धारणा को और अधिक पुख्ता न होने देना अत्यंत आवश्यक हो गया था।
सिक्के का दूसरा पहलू
- ऐसे भी कुछ तर्क हैं, जिनकी कल्पना प्रोफेसर गाडगिल के विरोधी नहीं कर सके थे, किन्तु जिन्हें इस दावे के पक्ष में कि बंबई का विलय महाराष्ट्र में होना चाहिए, न्यायपूवर्क और बलपूर्वक प्रस्तुत किया जा सकता है, हो सकता है कि ये तर्क आयोग को स्वयं ही सूझ जाएं, किन्तु मैं इस मामले को भाग्य के भरोसे छोड़ना नहीं चाहता, इसीलिए,