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महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत 145

मैं नीचे इनका भी विवेचन प्रस्तुत कर रहा हूं। हो सकता है कि मेरे इस प्रयास को आयोग वृथा प्रयत्न माने।

कलकत्ता और बंबई

  1. बंबई को महाराष्ट्र से विलग करने के मामले पर अपना फैसला देने से पहले आयोग को कलकत्ता की स्थिति पर भी विचार कर लेना होगा। बंबई की तरह कलकत्ता भी भारत के पूरे के पूरे पूर्वी भाग का मुख्य व्यापार केंद्र है। बंबई में जिस तरह महाराष्ट्रवादी अल्पसंख्यक हैं, ठीक वही स्थिति कलकत्ता में बंगालियों की है। बंबई के महाराष्ट्रवासियों की ही तरह कलकत्ता के बंगालियों का वहां के व्यापार और उद्योगों पर आधिपत्य नहीं है। बंबई के मराठी - भाषियों की तुलना में कलकत्ता के बंगालियों की स्थिति बदतर है। ऐसा इसलिए है कि मराठी भाषी कम से कम यह दावा तो कर ही सकते हैं कि बंबई के व्यापार और व्यवसाय में उनकी पूंजी नहीं लगी है तो क्या हुआ, वे वहां मजदूरों के रूप में काम तो कर ही रहे हैं। बंगाली तो यह दावा भी करने की स्थिति में नहीं हैं। यदि यह आयोग महाराष्ट्र से बंबई के विलगन के तर्कों को मान सकता है तो उसे इन्हीं तर्कों के आधार पर पश्चिम बंगाल से कलकत्ता के पृथक्करण की सिफारिश करने के लए भी तैयार रहना चाहिए, क्योंकि एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न यह पूछा जा सकता है कि यदि दिए गए कारणों से बंबई को महाराष्ट्र से अलग किया जा सकता है तो उन्हीं विद्यमान कारणों की वजह से कलकत्ता को पश्चिम बंगाल से अलग क्यों न कर दिया जाए।

क्या बंबई आर्थिक दृष्टि से आत्म - निर्भर है ?

  1. बंबई को महाराष्ट्र से अलग रखा जाए, इससे पहले यह सिद्ध किया जाना चाहिए कि क्या आर्थिक दृष्टि से बंबई आत्म - निर्भर प्रांत है। मैं पहले ही बता चुका हूं कि यदि राजस्व और व्यय का समुचित लेखांकन किया जाए तो कराधान के वर्तमान स्तर के आधार पर बंबई एक आत्म - निर्भर प्रांत नहीं बन सकेगा। यदि ऐसा है तो फिर बंबई को एक अलग प्रांत बनाने का प्रस्ताव धराशायी हो जाना चाहिए। उड़ीसा और असम जैसे प्रांतों के साथ बंबई की तुलना करना अनुचित होगा। बंबई में प्रशासन का स्तर, जीवन का स्तर और परिणमतः मजदूरी/वेतन का स्तर सभी इतने अधिक ऊंचे हैं कि यदि वहां कराधान की दरें कितनी भी अधिक क्यों न बढ़ा दी जाएं, वह अपने खर्चे के लिए आवश्यक मात्रा में राजस्व नहीं जुटा पाएगा।

बृहत्तर बंबई के प्रस्ताव का उद्देश्य

  1. बंबई प्रांत आर्थिक दृष्टि से आत्म - निर्भर हो सकेगा या नहीं, यह आशंका इसलिए भी बढ़ गई, क्योंकि बंबई सरकार ने अनुचित जल्दी दिखाते हुए तत्कालीन बंबई की सीमाओं में महाराष्ट्र के आसपास के हिस्सों को मिलाकर बृहत्तर बंबई का गठन कर दिया। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसा करने का एकमात्र उद्देश्य बंबई को आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर