166 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
यह बात कि वे अब तक एक रहे हैं, स्वाभाविक घटना नहीं है। इसका कारण यह है कि ये दोनों कांग्रेस के अनुशासन से बंधे हुए हैं। लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस कब तक टिकी रहेगी। कांग्रेस पंडित नेहरू से है और पंडित नेहरू कांग्रेस से। लेकिन क्या पंडित नेहरू अमर हैं? जो भी व्यक्ति इन प्रश्नों पर गौर करेगा, वह इस बात को स्वीकार करेगा कि कांग्रेस ‘सूरज और चांद की तरह सदा‘ नहीं रहेगी। एक न एक दिन उसका अंत होगा। हो सकता है, उसका अगले निर्वाचन के पहले ही अंत हो जाए। जब ऐसा हो जाएगा तो बंबई राज्य में गृह युद्ध छिड़ जाएगा और उसके लिए प्रशासन चलाना दूभर हो जाएगा।
इसलिए हम दो कारणों से भाषावार राज्यों की स्थापना चाहते हैं। लोकतंत्र के लिए मार्ग प्रशस्त करने और जातीय तथा सांस्कृतिक तनाव को दूर करने के लिए।
भाषावार राज्यों की स्थापना की दिशा में भारत सही मार्ग पर अग्रसर है। यह वही रास्ता है, जो सभी राज्यों ने अपनाया है। अन्य भाषावार राज्यों के संबंध में भी शुरू से ऐसा ही होता आया है। वहां तक भारत का संबंध हैं, यदि उसे अपने लक्ष्य तक पहुंचना है तो उसे कुछ पीछे की ओर जाना होगा। लेकिन जिस रास्ते पर उसे चलना है, वह उसका जाना - परखा रास्ता है। यह वही रास्ता है, जिस पर दूसरे राज्य चल रहे हैं।
भाषावार राज्य के लाभ गिनवाने के बाद अब मुझे भाषावार राज्य के खतरों की ओर भी इंगित कर देना चाहिए।
भाषावार राज्य, जिसकी राजभाषा उसकी क्षेत्रीय भाषा हो, बहुत आसानी से एक स्वतंत्र राष्ट्र बन सकता है। स्वाधीन राष्ट्र और स्वाधीन राज्य के बीच का मार्ग बहुत संकरा होता है। यदि यह हो जाए तो भारत वैसा आधुनिक भारत नहीं रहेगा, जैसा इस समय है, बल्कि मध्ययुगीन भारत बन जाएगा, जिसमें विभिन्न प्रकार के राज्य होंगे, जो प्रतिद्वंदिता और युद्ध में लगे रहेंगे।
जाहिर है कि भाषावार राज्यों के गठन में यह खतरा मौजूद है। लेकिन भाषावार राज्यों के न होने पर खतरा भी कुछ कम नहीं। जहां तक भाषावार राज्यों के गठन के खतरों का सवाल है, कोई बुद्धिमान और दृढ़ राजनेता उससे बचाव का रास्ता निकाल सकता है। लेकिन मिश्रित भाषावार राज्य के खतरे उनसे कहीं अधिक हैं और उन पर नियंत्रण करना किसी राजनेता के बस की बात नहीं होगी, चाहे वह कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो।
इस खतरे का सामना कैसा किया जाए? मेरे विचार में इस खतरे से तभी निपटा जा सकता है, जब संविधान में यह व्यवस्था रखी जाए कि क्षेत्रीय भाषा किसी भी राज्य की राजभाषा नहीं होगी। राज्य की राजभाषा हिन्दी रहेगी और जब तक भारत इस प्रयोजन के लिए योग्य न हो जाए, अंग्रेजी बनी रहेगी। क्या भारतवासी इसे स्वीकार करेंगे? यदि वे इसे स्वीकार नहीं करते तो भाषावार राज्य सहज ही देश के लिए खतरा बन जाएंगे।
एक भाषा जनता को एक सूत्र में बांध सकती है। दो भाषाएं निश्चय ही जनता में