भाषावार राज्यों के संबंध में विचार
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फूट डाल देंगी। यह एक अटल नियम है। भाषा, संस्कृति की संजीवनी होती है। चूंकि भारतवासी एकता चाहते हैं और एक समान संस्कृति विकसित करने के इच्छुक हैं, इसलिए सभी भारतीयों का यह भारी कर्तव्य है कि वे हिन्दी को अपनी भाषा के रूप में अपनाएं।
कोई भी भारतीय, जो इस प्रस्ताव को भाषावार राज्य के अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार नहीं करता, भारतीय कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता। वह शत - प्रतिशत महाराष्ट्रीय, शत - प्रतिशत तमिल या शत - प्रतिशत गुजराती तो हो सकता है, किन्तु वह सही अर्थ में भारतीय नहीं हो सकता, चाहे भौगोलिक अर्थ में भारतीय हो। यदि मेरा सुझाव स्वीकार नहीं किया जाता तो भारत, भारत कहलाने का पात्र नहीं रहेगा। वह विभिन्न जातियों का एक समूह बन जाएगा, जो एक - दूसरे के विरुद्ध लड़ाई - झगड़े और प्रतिस्पर्धा में रत रहेगा।
लगता है, भारत और भारतवासियों पर परमेश्वर का भारी प्रकोप है और वह कह रहा है, ‘तुम भारतीयों में हमेशा फूट रहेगी और तुम हमेशा दास बने रहोगे’
भारत के पाकिस्तान से अलग होने पर मुझे खुशी हुई। कहना चाहिए, पाकिस्तान की कल्पना मेरी ही थी। मैंने ही देश - विभाजन की वकालत की थी, क्योंकि मैं यह महसूस करता था कि केवल विभाजन ही ऐसा विकल्प है, जिसके फलस्वरूप हिन्दू न केवल स्वाधीन हो सकेंगे, वरन् मुक्त भी। यदि भारत और पाकिस्तान एक ही राज्य में एकजुट रहते तो हिन्दू स्वाधीन तो हो जाते, किन्तु वे मुसलमानों के वशीभूत रहते। स्वाधीन हो जाने मात्र से भारत हिन्दुओं के दृष्टिकोण से स्वतंत्र भारत न रह पाता। यह एक देश की दो राष्ट्रों द्वारा संचालित सरकार बन जाती और इन दोनों में से मुसलमान ही निःसंदेह शासक जाति बन जाते और हिन्दू महासभा और जनसंघ मूक - दर्शक बनकर रह जाते। जब देश का बंटवारा हुआ तो मैंने महसूस किया कि परमेश्वर अपना प्रकोप वापस लेने और भारत को संयुक्त, महान और समृद्ध बनाने के लिए सहमत हो गया है। लेकिन मुझे डर है कि यह प्रकोप फिर हो सकता है, क्योंकि मैं देख रहा हूं कि जो भाषावार राज्यों के गठन का समर्थन कर रहे हैं, उनके मन में यही है कि क्षेत्रीय भाषा को ही उनकी राजभाषा बनाया जाए।
ऐसा संयुक्त भारत के आदर्श के लिए घातक होगा। यदि क्षेत्रीय भाषाएं राजभाषाएं बन गई तो भारत को एक संयुक्त देश बनाने और भारतीयों को पक्का भारतीय बनाने का आदर्श ही समाप्त हो जाएगा। मैं तो इसका हल ही सुझा सकता हूं। उस पर सोच - विचार करना भारतवासियों का काम है।
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क्या एक भाषा के लिए एक ही राज्य होना आवश्यक है ?
भाषावार राज्य से क्या अभिप्राय है?
इससे अभिप्राय इन दो में से एक हो सकता है। इसका यह अर्थ हो सकता है कि