भाषावार राज्यों के संबंध में विचार
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उत्तर भारत का शासन भला दक्षिण वाले कैसे सहन कर सकते हैं? दक्षिण में उत्तर से अपने को पृथक करने के आसार दिखाई दे रहे हैं।
श्री राजगोपालाचारी ने राज्य पुनर्गठन आयोग सिफारिशों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए वक्तव्य दिया है, जो 27 नवम्बर, 1955 के ‘टाइम्स आफ इंडिया‘ में प्रकाशित हुआ है। उन्होंने कहा है :
यदि राज्य पुनर्गठन संबंधी योजनाओं को अगले 15 वर्षों के लिए स्थगित करना असंभव
है, तो केंद्र के पास एक ही विकल्प रह जाता है कि वह भारत पर ऐकिक राज्य के
रूप में शासन करे ओर जिला अधिकारियों तथा जिला बोर्डों का काम क्षेत्रीय आयुक्तों
की निगरानी में सीधे निपटाए
राष्ट्र की शक्ति को उन सीमाओं और खंडों के विवाद में नष्ट करना सर्वथा अनुचित
होगा, जिन पर इतिहास - जन्य परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में नहीं, बल्कि ड्राइंग रूप में
बैठकर विचार किया गया है।
अपने सामान्य विश्वासों के अतिरिक्त, मैं यह अनुभव करता हूं कि एक विशाल दक्षिणी
राज्य की परमावश्यकता है, जिससे कि देश के उस भाग की राजनीतिक विशेषता
को बनाए रखा जा सके। दक्षिण का तमिल, मलयालम और अन्य छोटे - छोटे राज्यों में
टुकड़े कर देने का यही परिणाम होगा कि हरेक राज्य की अस्मिता धूमिल हो जाएगी
और फलस्वरूप भारत की कुल मिलाकर हानि होगी।
श्री राजगोपालाचारी ने अपने विचार पूरी तरह से व्यक्त नहीं किए हैं। लेकिन उन्होंने मुझसे अपनी बात पूरी तरह और खुलकर उस समय कही थी, जब वे राज्याध्यक्ष थे और मैं विधि मंत्री था, जिसे संविधान का प्रारूप तैयार करने का दायित्व सौंपा गया था। मैं श्री राजगोपालाचारी से अपनी सामान्य भेंट के लिए गया था, जो उस समय की परिपाटी थी। ऐसी ही एक भेंट में श्री राजगोपालाचारी ने उस संविधान का हवाला देते हुए, जिसका संविधान सभा निर्माण कर रही थी, मुझसे कहा, ‘‘आप भारी गलती कर रहे हैं। समस्त भारत के लिए एक परिसंघ, जिसमें सभी क्षेत्रों का समान प्रतिनिधित्व हो, सफल नहीं हो पाएगा। ऐसे परिसंघ में भारत का प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति हमेशा हिन्दी - भाषी क्षेत्र से हुआ करेगा। आपको दो परिसंघों की व्यवस्था करनी चाहिए, एक परिसंघ उत्तर के लिए, एक दक्षिण के लिए और उत्तर तथा दक्षिण का एक संयुक्त परिसंघ, जिसके पास कानून बनाने के लिए तीन विषय हों और जिसमें दोनों परिसंघों का समान प्रतिनिधित्व हो।‘‘
ये श्री राजगोपालाचारी के वास्तविक विचार थे। मुझे लगा, जैसे आकाशवाणी हुई हो, क्योंकि ये विचार एक कांग्रेसी के अंतस्तल से निकले उद्गार थे। अब मैं श्री राजगोपालाचारी को भविष्यवक्ता मानता हूं, क्योंकि उन्होंने भारत के उत्तर और दक्षिण में विभक्त हो जाने की भविष्यवाणी की थी। हमें श्री राजगोपालाचारी की भविष्यवाणी को झुठलाने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए।