178 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
समिति की एक बैठक में भाषण देते हुए कहा था कि बंबई महाराष्ट्र का ही भाग है।
जनसंख्या कारक का मूल्यांकन करते समय जो दूसरा प्रश्न विचारणीय है, वह है शेष भारत से आने वाले लोगों का तांता, जो या तो लाभ कमाने के उद्देश्य से बंबई आते हैं या जीविकोपार्जन के लिए। उनमें से कोई भी बंबई को अपना घर नहीं समझता और इसीलिए उनमें से किसी को बंबई नगर का स्थायी निवासी नहीं समझना चाहिए। उनमें बहुत से तो कुछ महीनों के लिए ही आते हैं और वापस चले जाते हैं।
बंबई केवल महाराष्ट्रीयों के लिए घर है और किसी के लिए नहीं। इसलिए इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए कि बंबई शहर में बहुसंख्यक कौन लोग हैं, गैर - महाराष्ट्रियों को गिनना न तो तर्कसंगत है और न ही उचित।
इसके अतिरिक्त यही नहीं देखा गया कि बंबई में गैर - महाराष्ट्रीयों की जो बाढ़ चली आती है, उसका कारण ऐसे स्थानीय कानून का होना है, जिसके अनुसार नागरिकता की बढ़ती को रोका जा सके। यदि बंबई राज्य में ऐसा कानून होता है तो भारत के सभी भागों से बंबई आने वालों का प्रवाह रोका जा सकता था और महाराष्ट्रीयों का बहुमत बरकरार रखा जा सकता था।
यह भी अनुभव नहीं किया गया कि बंबई में गैर - महाराष्ट्रीयों का प्रवाह इसलिए और भी होता है कि बंबई एक बंदरगाह है और यह बंदरगाह इसके पश्चिमी तट पर है। यूरोप से बंबई का रास्ता यूरोप से कलकत्ता या यूरोप से मद्रास की अपेक्षा कहीं छोटा है। यही कारण है कि भारत के अन्य भागों से गरीब लोग भारी संख्या में अपने घर - बार छोड़कर अस्थायी निवास के लिए बंबई आते हैं। बंबई में दूसरे शहरों की तुलना में रोजगार तलाश करना भी आसान है।
सच तो यह है कि इस मामले पर भिन्न दृष्टिकोण से विचार किया जाना चाहिए। लोग विगत लगभग दो सौ वर्षों से बंबई आते रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद इस आवाजाही से महाराष्ट्रीयों की शहर में जनसंख्या 48 प्रतिशत से कम नहीं हुई है। दो सौ वर्ष बीत जाने के बाद भी इसकी जनसंख्या का स्वरूप मुख्यतः महाराष्ट्रीय ही बना हुआ है। इसका कारण नगर का प्रवासी स्वरूप है (देखें परिशिष्ट 3)। गुजराती लोग तो प्रवासी होते ही हैं।
कुछ अन्य तर्क भी ऐसे हैं, जो बंबई को महाराष्ट्र के एक भाग के रूप में बनाए रखने के पक्ष में प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
बंबई भारत का एकमात्र मिश्रित नगर नहीं है। कलकत्ता और मद्रास भी मिश्रित नगर हैं यदि कलकत्ता, पश्चिम बंगाल का और मद्रास, मद्रास राज्य का भाग हो सकता है, तो बंबई को महाराष्ट्र का भाग बना देने में क्या आपत्ति है? यही वह प्रश्न है, जो प्रत्येक महाराष्ट्रीय पूछेगा। मेरे पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है। मेरे मस्तिष्क में एक ही उत्तर आता है, जो यह है कि कांग्रेस की आला कमान का यह विचार है कि महाराष्ट्रीय दूसरों पर शासन करने के योगय नहीं है। यह महाराष्ट्रीयों के चरित्र पर एक लाछंन है और वे उसे हरगिज सहन नहीं करेंगे।