5. भाषावार राज्यों के संबंध में विचार - Page 196

भाषावार राज्यों के संबंध में विचार

179

कहा जाता है कि बंबई गैर - महाराष्ट्रीयों की पूंजी के बल पर बना है। हो सकता है ऐसा ही हो। लेकिन क्या मद्रास मद्रासियों की पूंजी के बल पर बनाया गया है? क्या कलकत्ता बंगालियों की पूंजी से बना है? अगर यूरोपीय लोग मद्रास और कलकत्ता में पूंजी निवेश न करते तो ये दोनों गांव ही बने रहते। फिर भला महाराष्टी्रयों के खिलाफ यह दलील क्यों दी जाती है, जब वे बंबई को अपना बताते हैं। महाराष्ट्रीयों ने बंबई को मजदूर तो दिए ही हैं, जिनके बिना बंबई नगर वह नहीं हो सकता था, जो वह आज है। यह हमेशा याद रखना चाहिए कि बंबई का अस्तित्व महाराष्ट्र पर ही निर्भर है। उसके विद्युत के संसाधन महाराष्ट्र में हैं। उसकी जलपूर्ति के साधन महाराष्ट्र में हैं। उसके श्रमिकों के साधन महाराष्ट्र में हैं। महाराष्ट्र किसी भी समय बंबई नगर को मोहनजोदाड़ों में परिवर्तित कर सकता है।

गुजराती लोगों को यह डर है कि महाराष्ट्रीय उनके साथ भेदभाव का व्यवहार करेंगे लेकिन हमारे संविधान के अनुसार भेदभाव इसलिए संभव नहीं है क्योंकि संविधान में उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यालय के आदेश के रूप में मौलिक अधिकारों और उपचारों की सूची दी गई है, जिनके अधीन किसी भी अन्याय का तत्काल निवारण कराया जा सकता है। भेदभाव - जन्य किसी भी प्रकार के अन्याय के लिए संविधान में उपचार की व्यवस्था है। भला गुजरातियों को डरने की क्या आवश्यकता है?

आइए, अब हम इस पर विचार करें कि गुजरातियों को बंबई के एक पृथक नगर राज्य बन जाने से क्या लाभ पहुंचेगा। बंबई राज्य में उनकी आबादी केवल 10 प्रतिशत है। उन्हें बंबई के नगर राज्य की विधानसभा में कितनी सीटें मिल जाएंगी? 10 प्रतिशत भी नहीं। फिर भला 10 प्रतिशत लोग 90 प्रतिशत के मुकाबिले में अपने मुवक्किलों की रक्षा कैसे कर पाएंगे?

यह स्मरणीय है कि महाराष्ट्रियों और गुजरातियों के बीच जो प्रतिद्वंद्विता की भावनाएं हैं, वे पहले से कहीं अधिक उत्तेजित होती जाएंगी। महाराष्ट्रीय, गुजराती उम्मीदवार को मत नहीं देगा और गुजराती मतदाता किसी महाराष्ट्रीय प्रत्याशी को मत नहीं। अब तक तो गुजराती पैसों से महाराष्ट्र में अपना काम निकाल रहे हैं। लेकिन एक बार आत्म - सम्मान जाग जाए तो पैसा भी कुछ नहीं कर पाएगा। गुजरातियों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि परस्पर सद्भाव से अधिक संरक्षण मिल सकता है, या नगर के शासन में छोटी - छोटी भागीदारी से?

वैसे तो महाराष्ट्र का पक्ष फौलाद की तरह मजबूत है, लेकिन कुछ बातें दूसरे पक्ष की ऐसी हैं, जिन पर उन्हें ठंडे दिल से गौर करना चाहिए।

वे चाहते हैं कि बंबई महाराष्ट्र ही में रहे। लेकिन उनके लिए विचारणीय प्रश्न यह है कि आखिर वे चाहते क्या हैं? क्या वे चाहते हैं कि बंबई प्रगति करता रहे, या वे चाहते हैं कि वह पतनशील हो जाए? क्या बंबई महाराष्ट्र में रहते हुए फल - फूल सकता है? इसका प्रकरांतर से यह अर्थ है : क्या महाराष्ट्र बंबई नगर के वर्द्धमान व्यापार और उद्योग - धंधों के लिए आवश्यक पूंजी जुटा सकता है? कोई भी महाराष्ट्रीय इस प्रश्न का उत्तर ‘हां‘ में नहीं दे सकता। महाराष्ट्रीय वर्षों के बाद इस स्थिति में आ पाएंगे कि पूंजी की आवश्यकता पूरी कर सके। फिलहाल तो ऐसा संभव नहीं जान पड़ता।