184 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
से क्या दिलचस्पी होगी? समेकन का कोई मतलब नहीं है और उससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता।
वर्तमान बंबई के मंत्रिमंडल में जितने भी मराठा मंत्री हैं, सभी सतारा या नासिक जिले के हैं। कोई भी कोंकण का नहीं है।
दूसरी बात गौर करने की यह है कि महाराष्ट्र के तीनों भागों में कोई आर्थिक समानता नहीं है। मराठवाड़े की निजाम ने सर्वथा उपेक्षा ही की है। इस बात की क्या गारंटी है कि अन्य दो महाराष्ट्र उस महाराष्ट्र के हितों की देखभाल करेंगे, जिसे मैंने मध्य महाराष्ट्र की संज्ञा दी है।
महाराष्ट्र के तीनों भागों में औद्योगिक समानता तीसरा मुद्दा है, जिस पर विचार किया जाना है। पश्चिमी महाराष्ट्र और पूर्वी महाराष्ट्र औद्योगिक दृष्टि से सुविकसित हैं। लेकिन मध्य महाराष्ट्र की क्या स्थिति है? उसके औद्योगिक विकास की क्या गारंटी है? क्या पश्चिमी महाराष्ट्र और पूर्वी महाराष्ट्र, मध्य महाराष्ट्र के औद्योगिक विकास में रूचि दिखाएंगे?
चौथी बात जिस पर गौर किया जा सकता है, वह एक ओर तो यह है कि पूर्वी और पश्चिमी महाराष्ट्र और दूसरी ओर पूर्वी और मध्य महाराष्ट्र पूना में शिक्षा की असमानता है। उनके बीच की असमानता भी अच्छी खासी है। यदि मध्य महाराष्ट्र पूना विश्वविद्यालय के अधीन चला गया तो उसका भाग्य फूटा।
मुझे मराठवाड़ा की भारी चिंता है। उस पर विगत 200 वर्षों से निजाम का शासन था। निजाम ने इस क्षेत्र की घोर उपेक्षा की और उसमें कोई दिलचस्पी नहीं ली। मराठवाड़ा में कोई एक मील जमीन ऐसी नहीं मिलेगी, जहां नहरी सिंचाई होती हो। वहां के ताल्लुक क्षेत्रों में शायद ही कोई हाई स्कूल हो। निजाम की लोक सेवा में मराठवाड़ा के युवक का नाम - निशान नहीं मिलेगा। मैं अपनी जानकारी और अनुभव के आधार पर यह बात कह रहा हूं। लोग ने केवल गरीब हैं, बल्कि अज्ञानी भी हैं। उन्हें धनी - मानी लोगों ने दोनों तरफ से दबोच रखा है। जब उनके रोजगार के रास्ते बंद हो जाएंगे, तो उनकी और भी दुर्गति होगी।
मैं यह सोचकर कांप उठता हूं कि जब मराठवाड़ा पूना विश्वविद्यालय के अधीन चला जाएगा, तो उसका क्या हश्र होगा। पूना विश्वविद्यालय के अधीन स्कूल - कॉलेजों में शिक्षा का स्तर इतना ऊंचा है कि मराठवाड़ा का कोई लड़का शायद ही परीक्षा पास कर सके। पूर्ण संभव है कि संयुक्त महाराष्ट्र के लिए जिस प्रकार के पागलपन का प्रदर्शन किया जा रहा है, उससे अकेले और सबके लिए समान विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए पागलपन पैदा होगा।
उधर संयुक्त महाराष्ट्र की रचना हुई और उधर पूना और नागपुर के ब्राह्मणों ने नौकरियों के लिए मराठवाड़ा पर धावा बोला।
महाराष्ट्र के तीन भागों में विभक्त किए जाने का एक और कारण भी है।