5. भाषावार राज्यों के संबंध में विचार - Page 205

188 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

भाषा बोलते हैं, एक ही शासन के अधीन रखे जाएं, चाहे क्षेत्रफल, जनसंख्या

और उस भाषा के बोलने वालों की परिस्थितियों में कितनी ही भिन्नता क्यों

न हो। बंबई को शामिल करके एक संयुक्त महाराष्ट्र का निर्माण करने के

लिए किए गए आंदोलन के मूल में यही विचार निहित है। यह एक बेतुका

फार्मूला है, जिसकी कोई मिसाल नहीं मिलती। इसका परित्याग किया जाना

चाहिए। एक ही भाषा बोलने वाले लोगों को एक से अधिक राज्यों में बांटा

जा सकता है, जैसा कि संसार के अन्य भागों में किया जाता है।

(5) एक ही भाषा बोलने वाले लोगों को कितने राज्यों में बांटा जाए, यह इन

बातों पर निर्भर होगा : (1) कारगर प्रशासन की अपेक्षाएं, (2) विभिन्न क्षेत्रों

की आवश्यकताएं, (3) विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की भावनाएं, और (4) बहुमत

तथा अल्पमत के लोगों का अनुपात।

(6) ज्यों - ज्यों राज्य का क्षेत्रफल बढ़ता है, अल्पसंख्यकों का बहुसंख्यकों के साथ

अनुपात घटता जाता है और अल्पसंख्यकों की स्थिति नाजुक हो जाती है

तथा बहुसंख्यकों के लिए अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करने के अवसर कई

गुना बढ़ जाते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि राज्यों का आकार छोटा हो।

(7) बहुसंख्यकों के अत्याचार को रोकने के लिए अल्पसंख्यकों को संरक्षण दिया

जाना चाहिए। ऐसा करने के लिए संविधान में संशोधन किया जाना चाहिए

और बहु - सदस्य निर्वाचन क्षेत्र (दो या तीन) पर आधारित पद्धति के लिए,

जिसमें संचित मतदान की व्यवस्था हो, प्रावधान किए जाने चाहिएं।

भाग IV
भाषावार राज्यों की समस्याएं
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व्यवहार्यता

क्या तीन महाराष्ट्रीय राज्य बने रह सकते हैं? क्या उनका राजस्व उनके व्यय के लिए पर्याप्त हो सकता है? ऐसा प्रश्न उठाया जाना स्वाभाविक है।

यह बात नहीं कि इस प्रकार के प्रश्न केवल महाराष्ट्र के संबंध में ही किया जा सकता है। यही प्रश्न भारत के अनेक राज्यों के बारे में भी किया जा सकता है।

मैं कराधान जांच समिति की जिसके अध्यक्ष डॉ. जॉन मथाई, थे, रिपोर्ट के भाग