भाषावार राज्यों के संबंध में विचार
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III के ‘‘क‘‘ और ‘‘ख‘‘ भाग के राज्यों तथा केंद्रीय सरकार से संबंधित चार विवरण उद्धृत करता हूं (देखें सारणी 4,5,6 और 7)। इन विवरणों से निम्नांकित प्रस्ताव सामने आते हैं।
(1) राज्यों में एक वर्ष विशेष तक कोई घाटा नहीं हुआ था। वे सब जीवनक्षम
थे। कांग्रेस के सत्तारूढ़ होने के बाद से राज्य टिक नहीं पाए।
(2) जब से कांग्रेस सत्तारूढ़ हुई, उत्पादन शुल्क से होने वाली आय घटनी शुरू
हो गई। और अब तो समाप्त प्रायः है।
(3) आयकर और बिक्री कर में भारी वृद्धि हुई है।
यही वे कारण हैं, जिनसे पता चलता है कि राज्यों की व्यवहार्यता क्यों समाप्त
हो गई हैं।
उत्पाद शुल्क से होने वाली आय एक मिथ्या सिद्धांत पर बलि कर दी गई,
जिसका न कोई अर्थ है और न ही कोई वास्तविकता।
जहां तक नशाबंदी की नीति का संबंध है जो कांग्रेस ने अपनाई थी, निम्नलिखित निष्कर्ष बेखटके और बिना किसी चुनौती की आशंका के निकाले जा सकते हैं :
(1) राजस्व की एक भारी राशि व्यर्थ ही गंवा दी गई।
(2) जनता ने मद्यपान करना नहीं छोड़ा। अवैध शराब का भारी मात्रा में उत्पादन
हो रहा है और वह चोरी छिपे जनता को बेची जा रही है।
(3) इससे सरकार ने जो धन खोया वह अवैध निर्माता ने पा लिया।
(4) मद्यनिषेध ने समाज को भ्रष्ट कर दिया है। पहले तो परिवार में केवल पुरुष
सदस्य ही शराब पीते थे क्योंकि वे ही शराब की दुकानों पर जा सकते थे।
अब अवैध शराब का निर्माण घर - घर में होने लगा है। जो शराब अब घरों
में बनती है उसे पुरुष, स्त्री दोनों पीते हैं।
(5) मद्यनिषेध के कारण सरकार को राजस्व की हानि तो हुई ही है, इसके अलावा
उसे शराबबंदी लागू करने के लिए पुलिस पर भी अधिक खर्च करना पड़ता
है, हालांकि पुलिस उसे लागू करने के लिए कुछ नहीं करती।
इस मद्यनिषेध से क्या फायदा है, जो निषेध नाम मात्र को भी नहीं करता? कांग्रेस ने मद्यनिषेध को सारे भारत में लागू करने की धमकी दी है। ईश्वर कांग्रेस को चिरायु करे। कहावत है कि ईश्वर जिसे नष्ट करना चाहता है, पहले उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर देता है। यहीं वह कांग्रेसियों के साथ कर रहा है।
मेरे लिए इतना ही यह देना पर्याप्त है कि कांग्रेस को एक ही विकल्प चुनना होगा, या तो जीवित रहे, या मद्यनिषेध जारी रखे।