190 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
भूमि राजस्व के बारे में यही कह देना पर्याप्त है कि वह निश्चित रूप से बढ़ाया जा सकता है। लेकिन कांग्रेस तो वोट खो देने के डर से खेतिहर को छूना ही नहीं चाहती यही कारण है कि वह बिक्री कर और आयकर जारी रखकर ही धनार्जन करना चाहती है, जिनमें दोनों का ही शहरी वर्गों पर भारी दबाव पड़ता है। यह बात सारणी 6 से स्पष्ट हो जाएगी।
इस प्रकार यह बात स्पष्ट जाती है कि जीवन क्षमता की कोई समस्या नहीं है, आवश्यकता केवल इस बात की है कि कांग्रेस अपनी कराधान नीति पर पुनर्विचार करे।
जीवन क्षमता कराधान सहन करने की क्षमता और कर लगाने की इच्छा पर निर्भर है। क्षमता पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, आवश्यकता इच्छाशक्ति की है।
भारत की समस्त कराधान प्रणाली में परिवर्तन की आवश्यकता है। यह संविधान को बदल देने का प्रश्न है। लेकिन मैं इस समय इस पर चर्चा नहीं कर सकता, मैं उसे किसी और अवसर के लिए उठाए रखता हूं।
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बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक
यथार्थवादिता ही राजनीति का मूल है। इसमें शास्त्रीयता का तत्व नगण्य है। अतः इससे निष्कर्ष निकलता है कि किसी भी राजनीतिक योजना पर निर्णय लेने से पूर्व हमारे लिए यह आवश्यक है कि बुनियाद - खाके पर विचार किया जाए।
कोई भी मुझसे यह पूछ सकता है कि ‘‘बुनियाद - खाका‘‘ से मेरा क्या अभिप्राय है। मैं समझता हूं कि बुनियाद - खाके का अर्थ, किसी समुदाय की सामाजिक संरचना से है, जिस पर राजनीतिक योजना लागू की जाने वाली है।
यह बताने के लिए किसी तर्क की आवश्यकता नहीं है कि राजनीतिक संरचना सामाजिक संरचना पर ही टिकी होती है। सच तो यह है कि सामाजिक ढांचे का राजनीतिक ढांचे पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वही उसकी कार्य प्रणाली में संशोधन कर सकता है। वही उसे रद्द भी कर सकता है, बल्कि चाहे तो उसका खाका भी उड़ा सकता है।
भारत के संदर्भ में सामाजिक ढांचा जाति - व्यवस्था पर खड़ा है, जो हिन्दू सभ्यता और संस्कृति की विशिष्ट परिणति है।
जाति - व्यवस्था इतनी जानी - मानी है कि इसके स्वरूप को समझाने में किसी को समय नहीं लगता। कोई भी सीधे यह बता सकता है कि भाषावार राज्यों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
फिर भी जाति व्यवस्था के कुछ विशिष्ट लक्षण है, जिनका उल्लेख किया जा सकता है :