5. भाषावार राज्यों के संबंध में विचार - Page 208

भाषावार राज्यों के संबंध में विचार

191

(1) जातियों का विभाजन इस प्रकार किया गया है कि किसी भी क्षेत्र विशेष में एक

जाति प्रधान है, जब कि दूसरी जो छोटी जातियां है, प्रधान जाति की वंशवर्ती

हैं, क्योंकि वे अपेक्षया छोटी जातियां हैं प्रधान जाति पर उनकी आर्थिक निर्भरता

है, क्योंकि गांव की अधिकांश भूमि उसी प्रधान जाति की संपत्ति है।

(2) जाति - व्यवस्था का प्रमुख लक्षण केवल असमानता ही नहीं है, बल्कि उस पर

श्रेणीगत असमानता की व्यवस्था की भी छाया है। सभी जातियां बराबर की

नहीं हैं। उनमें भी ऊंच - नीचे का भेद है। इनमें घृणा का आरोही मान है और

तिरस्कार का अवरोही।

(3) किसी भी जाति में अनन्यता और गर्व का भाव उसी प्रकार होता है, जैसे राष्ट्र

में। इसलिए जिस प्रकार छोटे और बड़े राष्ट्रों को एक समूह कहा जाता है, वैसे

ही जाति समूह कहना भी अनुचित नहीं है।

मुझे खेद है कि मैं इन बातों को तथ्यों और अंकों के द्वारा स्पष्ट नहीं कर सकता। जनगणना ही इन मुद्दों पर सूचना का एकमात्र साधन है और उससे मुझे कोई सहायता नहीं मिल सकी है। पिछली जनगणना में जातियों की सारणियां नहीं दी गई थीं, जो कि प्रारंभ ही से भारतीय गणना का मुख्य लक्षण रहा है। भारत सरकार के गृह मंत्री, जो इस भूल के लिए उत्तरदायी हैं, का यह मत है कि यदि कोई शबद, शब्दकोश में न मिले तो यह सिद्ध किया जा सकता है कि जिस तथ्य का वह शब्द निर्देश करता है, उसका अस्तित्व ही नहीं है। ऐसे लेखक की क्षुद्र बुद्धि पर मुझे तरस आता है।

जाति - व्यवस्था का जो प्रभाव राजनीति पर पड़ा है, वह सर्वथा स्पष्ट है। इसका दिलचस्प हिस्सा यह देखना है कि इसका चुनावों पर क्या प्रभाव पड़ा है जो प्रतिनिधि सरकार की बुनियाद है, जिस पर एकल सदस्य निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था खड़ी होती है। इसके जो प्रभाव होते हैं, उनका सार नीचे दिया जा रहा है :

(1) मतदान हमेशा सांप्रदायिकता के आधार पर होता है। मतदान अपने समुदाय के

प्रत्याशी को मत देता है, श्रेष्ठ प्रत्याशी को नहीं।

(2) बहुसंख्यक समुदाय मात्र सांप्रदायिक बहुमत से सीट जीत जाता है।

(3) अल्पसंख्यक समुदाय को बहुसंख्यक समुदाय के प्रत्याशी को मत देने के लिए

बाध्य किया जाता है।

(4) अल्पसंख्यक समुदाय के इतने मत नहीं होते कि उनका उम्मीदवार बहुसंख्यक

समुदाय द्वारा खड़े किए गए उम्मीदवार के विरुद्ध सीट जीत ले।

(5) उच्चतर (प्रधान) समुदायों का मतदाता श्रेणीबद्ध असमानता की सामाजिक व्यवस्था

से प्रभावित होने के कारण अल्पसंख्यक समुदाय के किसी उम्मीदवार को अपना

वोट देने की उदारता कभी नहीं जुटा सकता। बल्कि इसके विपरीत अल्संख्यक

समुदाय का मतदाता, जिसका सामाजिक स्तर निम्न है अपना मत बहुसंख्यक