भाषावार राज्यों के संबंध में विचार
193
जाति भी राष्ट्र ही होती है, किन्तु एक जाति का दूसरी जाति पर शासन उसी प्रकार स्वीकार्य नहीं हो सकता, जिस प्रकार एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र पर। लेकिन मान लीजिए कि इस मुद्दे को इतना लंबा न खींचा जाए, बल्कि बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों तक ही सीमित कर दिया जाए, फिर भी यह प्रश्न तो शेष रह ही जाता है : बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों पर शासन करने का क्या अधिकार है?
इस प्रश्न का उत्तर यह है कि जो कुछ भी बहुसंख्यक करते हैं, वह सही होता है। फिर अल्पसंख्यकों को क्या शिकायत हैं?
जो लोग बहुमत के शासन पर निर्भर रहते हैं, यह तथ्य भूल जाते हैं कि बहुमत भी दो प्रकार का होता हैं (1) सांप्रदायिक बहुमत, और (2) राजनीतिक बहुमत।
राजनीतिक बहुमत अपनी वर्ग रचना में परिवर्तित होता रहा है। राजनीतिक बहुमत बढ़ता रहता है। सांप्रदायिक बहुमत पैदा होता है। राजनीतिक बहुमत में प्रवेश खुला रहता है। सांप्रदायिक बहुमत का द्वार बंद रहता है। राजनीतिक बहुमत की राजनीति को बनाने - बिगाड़ने की सभी को स्वतंत्रता होती है। सांप्रदायिक बहुमत की राजनीति उसके अपने सदस्यों द्वारा बनाई जाती है, जो उसी में जन्में हैं।
भला किसी सांप्रदायिक बहुमत द्वारा उस अधिकार - पत्र को कैसे हथियाने दिया जाए, जो राजनीतिक बहुमत को शासन चलाने के लिए दिया गया था? इस प्रकार के अधिकार - पत्रों का सांप्रदायिक बहुमत को दिया जाना आनुवंशिक सरकार की स्थापना करने और उस बहुमत की निरंकुशता के लिए मार्ग प्रशस्त करने के समान है। सांप्रदायिक बहुमत की यह निरंकुशता महज एक कल्पना नहीं है, यह अनेक अल्पसंख्यकों का अनुभव रहा है, चूंकि महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों के लिए यह अनुभव हाल ही का है, इसलिए उसका विवेचन अनावश्यक है।
आखिर इसका इलाज क्या है? इसमें संदेह नहीं कि इस सांप्रदायिक तानाशही को रोकने के लिए कुछ रक्षोपाय आवश्यक हैं। प्रश्न यह उठता है कि वे रक्षोपाय क्या हो सकते हैं? पहला रक्षोपाय तो यह है कि बहुत बड़ा राज्य न बनाया जाए। बहुत बड़े राज्य का उसमें रहने वाले अल्पसंख्यकों पर क्या असर पड़ता है, इसे बहुत से लोग समझ नहीं पाते। जितना बड़ा राज्य होगा, अल्पसंख्यकों का बहुसंख्यकों से अनुपात उतना ही छोटा होगा। एक उदाहरण लें - यदि महाविदर्भ पृथक रहता तो हिन्दुओं का मुसलमानों से अनुपात 4ः1 होता और संयुक्त महाराष्ट्र में अनुपात 14ः1 होता। यही स्थिति अछूतों की होती। समेकित बहुसंख्यकों का एक छोटा सा पत्थर यदि अल्पसंख्यकों की छाती पर रख दिया जाए तो सह्य होगा। लेकिन विशाल पर्वत का बोझ वे नहीं झेल सकेंगे। वह तो अल्पसंख्यकों को कुचल कर रख देगा। इसलिए छोटे राज्यों का निर्माण अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान कर सकता है।
दूसरा रक्षोपाय यह है कि विधानसभा में उनके प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया जाए। संविधान में जो पुराने किस्म के उपायों का प्रावधान था, वे दो थे (1) आरक्षित स्थानों की एक विशेष संख्या, और (2) पृथक निर्वाचक मंडल। इन दोनों रक्षोपायों का नए संविधान में