भाषावार राज्यों के संबंध में विचार
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सुविधा एक महत्वपूर्ण कारण है। दिल्ली दक्षिण के लोगों के लिए बहुत असुविधाजनक है। इनके लिए यहां की ठंड और यहां तक की दूरी दोनों कष्टकर हैं। गर्मी के महीनों में तो उत्तर भारत के लोगों को भी बड़ा कष्ट होता है। वे तो इसलिए कोई शिकायत नहीं करते कि वे अपने निवास स्थानों के और सत्ता - स्थल के निकट हैं। इस कारण दक्षिण भारतीयों की भावनाएं हैं और तीसरा है प्रतिरक्षा। दक्षिण भारतीयों का विचार है कि उनके देश की राजधानी उनसे बहुत दूर स्थित है और उन पर उत्तर भारत के लोगों का शासन है। तीसरा कारण जाहिर है और ज्यादा महत्वपूर्ण है। वह यह है कि दिल्ली एक सहज भेद्य स्थान है। इसकी पड़ोसी देशों से दूरी बमबारी के लिए बहुत थोड़ी है। यद्यपि भारत अपने पड़ोसियों के साथ शांतिपूर्ण ढंग से रहने के लिए प्रयत्नशील है, फिर भी यह मान लेना उचित नहीं है कि भारत को कल युद्ध का सामना नहीं करना पड़ेगा, और यदि युद्ध छिड़ गया तो भारत सरकार को दिल्ली छोड़कर अन्यत्र अपनी सुविधा की राजधानी बनानी पड़ेगी। वह कौन - सी जगह है, जहां भारत सरकार जाएगी? हमारी समझ में तो एक ही स्थान आता है और वह है, कलकत्ता। लेकिन कलकत्ता में भी तिब्बत से बमबारी का खतरा हो सकता है। हालांकि भारत और चीन में आज भी मैत्री संबंध है, लेकिन यह मैत्री कब तक चलेगी कोई भी निश्चय के साथ नहीं कह सकता। भारत और चीन में कभी भी टकराव पैदा हो सकता है। और ऐसी स्थिति में कलकत्ता को राजधानी बनाना बेकार है। दूसरा शहर जिस पर केंद्र सरकार के शरण - स्थल के रूप में विचार किया जा सकता है, बंबई है। लेकिन बंबई एक बंदरगाह है और भारतीय नौसेना, केंद्र सरकार के बंबई आ जाने पर उसकी रक्षा करने में समर्थ नहीं हो सकता। क्या किसी चौथी जगह के बारे में भी सोचा जा सकता है? मेरी दृष्टि में ऐसी जगह हैदराबाद हो सकती है। हैदराबाद, सिकंदराबाद और बोलारम को मुख्य आयुक्त के प्रांत के रूप में गठित करके उसे भारत की दूसरी राजधानी बनाया जा सकता है। हैदराबाद भारत की राजधानी की सभी आवश्यकताएं पूरी करता है। उसकी सभी राज्यों से समान दूरी है। जो भी निम्नांकित सारणी पर दृष्टिपात करेगा, यह महसूस करेगा :
| e | hy |
|---|
| gSnjk | ckn |
|---|
| e | hy |
|---|
दिल्ली से मील
बंबई 798 440 कलकत्ता 868 715 मद्रास 1,198 330 कर्नूल 957 275 त्रिवेंद्रम 1,521 660 पटियाला 124 990 चंडीगढ़ 180 1,045 लखनऊ 275 770